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________________ प्रथम अध्याय : देव (अर्हन्त-सिद्ध) से कहा गया है क्योंकि उनमें द्रव्यमन तो है, भावमन नहीं है। द्रव्यमन सहित होते हुए भी केवली को 'संज्ञी' नहीं माना गया है, क्योंकि मन के आलम्बन से उनके बाह्य पदार्थों का ग्रहण नहीं होता है। प्राणों की अपेक्षा सयोग केवली के चार अथवा दो प्राण माने गए हैं, द्रव्येन्द्रियों की अपेक्षा दश प्राण नहीं हैं। अयोग केवली के केवल 'आयु' प्राण होता है। केवली के शुक्ल लेश्या। उपयोग तथा ध्यान भी औपचारिक ही है। केवली के इच्छा का अभाव होने से उनकी विहार, धर्मदेशना आदि में अबुद्धिपूर्वक स्वाभाविक प्रवर्तना मानी गई है। 4. केवली समुद्घात क्रिया- कर्मों की स्थिति (ठहरने की काल-सीमा) और अनुभागबन्ध (रसपरिपाक) को घातने के लिए किया गया समीचीन उपक्रम 'केवलीसमुद्घात' है। जब आयुकर्म की अपेक्षा अन्य तीन अघातिया कर्मों की स्थिति देव, शास्त्र और गुरु हैं। अर्हन्तों के जो ग्यारह परिषह कहे गए हैं वे उपचार से कहे गए हैं तथा उपचार का कारण है 'असातावेदनीय का उदय'। मोहनीय और अन्तराय कर्म के नष्ट हो जाने से असातावेदनीय निष्क्रिय है तथा वह सातारूप परिणमन कर जाता है। अर्हन्त के कवलाहार तो नहीं है, परन्तु नोकर्माहार होता है। अतः आहारक मार्गणा में 'आहार' शब्द से नोकर्माहार ही ग्रहण करना चाहिए, कवलाहार नहीं। किन्तु समुद्घात अवस्था में नोकर्माहार भी नहीं होता है। 3. अर्हन्तों में इन्द्रिय, मन,ध्यान,लेश्या आदि का विचार- पञ्चेन्द्रियजाति नामकर्म के उदय से अर्हन्तों के पाँच द्रव्येन्द्रियाँ मानी गई हैं, भावेन्द्रियाँ नहीं, क्योंकि भावेन्द्रियों की विवक्षा होने पर ज्ञानावरण का सद्भाव मानना पड़ेगा और तब उनमें सर्वज्ञता न बन सकेगी। अतः अर्हन्तों के द्रव्येन्द्रियों की अपेक्षा पञ्चेन्द्रियत्व तो है, परन्तु भावेन्द्रियों की अपेक्षा नहीं है। वस्तुतः उन्हें पञ्चेन्द्रिय कहना औपचारिक प्रयोग है। इसी प्रकार अर्हन्त केवली के 'मन' भी उपचार १.(क) चउविह उवसग्गेहि णिच्चविमुक्को कसायपरिहीणो। छुहपहुदिपरिसहेहिं परिचत्तो रायदोसेहिं।। -ति०प० 1/59. (ख) मोहनीयोदयसहायाभावात्क्षुदादिवेदनाभावे परिषहव्यपदेशो न युक्तः / सत्यमेवमेतत् वेदनाभावेऽपि द्रव्यकर्मसद्भावापेक्षया परिषहोपचारः क्रियते। -सर्वार्थसिद्धिः 9/11/429/8 गट्ठा य रायदोसा, इंदियणाणं च केवलिम्हि जदो। तेण दु सादासादजसुहदुक्खं णत्थि इंदियज।। -गोकर्म०२७३. समयट्ठिदिगो बंधो सादस्सुदयप्पिगो जदो तस्स। तेण असादस्सुदओ सादसरूवेण परिणदि।। - गो.कर्म०२७४, २.(क) पंडिसमयं दिव्वतमं जोगी णोकम्मदेहपडिबद्धं। समयपबद्धं बंधदि गलिदवसेसाउमेत्तहिदी।। -क्षपणा० 618 अत्र कवललेपोष्ममना कर्माहारान् परित्यज्य नोकर्माहारो ग्राहाः, अन्यथाहारकालविरहाभ्यां सह विरोधात्। -ध०१/१.१.१७३/४०९/१० (ख) अणाहारा ........... केवलीणं वा समुग्घादगदाणं अजोगिकेवली ...........चेति। __-षट्खण्डागम, 1/1.1.177/410 कम्मग्गहणमत्थित्तं पडुच्च आहारित्तं किण्ण उच्चदित्ति भणिदेण उच्चदि, आहारस्स तिण्णिसमयविरहकालोवलद्धीदो। -ध० 2/3.1/669/5. णवरि समुग्घादगदे पदरे तह लोगपूरणे पदरे। णस्थि ति समये णियमा णोकम्माहारयं तत्थ / / -क्षपणा० 619 पञ्चेन्द्रियजातिनामकर्मोदयात्पश्चेन्द्रियः। -ध०१/१.१.३९/२६४/२ आर्ष हि सयोगिकेवलिनोः पञ्चेन्द्रियत्वं द्रव्येन्द्रियं प्रति उक्त, न भावेन्द्रियं प्रति। यदि, हि भावेन्द्रियमभविष्यत्, अपितु तर्हि असंक्षीणसकलावरणत्वात् सर्वज्ञतैवास्य न्यवर्तिष्यत्। -राजवार्तिक, 1/30/9/91/14, केवलिनां पञ्चेन्द्रियत्वं ............. भूतपूर्वगतिन्यायसमाश्रयणाद्वा। -ध. 1/1.1.37/263/5. 1. अतीन्द्रियज्ञानत्वान्न केवलिनो मन इति चेन्न, द्रव्यमनसः सत्त्वात्। -ध० 1/1.1.50/286. उपचारतस्तयोस्ततः समुत्पत्तिविधानात्। -ध० 1/1.1.50/287. मणसहियाणं वयणं दिटुं तत्पुव्वमिदि सजोगम्हि। उत्तो मणोवयारेणिदियणाणेण हीणम्मि।। -गो०जीव० 228. 2. तेषां क्षीणावरणानां मनोऽवष्टम्भबलेनबाह्यार्थग्रहणाभावतस्तदसत्वात्। तर्हि भवन्तु केवलिनोऽसंजिन इति चेन्न, साक्षात्कृताशेषपदार्थानामसंज्ञित्वविरोधात्। -ध०, 1/1.1.173/408 3. तम्हा सजोगिकेवलिस्स चत्तारि पाणा दो पाणा वा। -502/1.1/444/6. आउअ-पाणो एक्को चेव। -ध० 2/1.1/445/10 तथा देखिए, पर्याप्ति आदि के लिए, जैनेन्द्रसिद्धान्तकोश, भाग 2, पृ० 164. 4. स०सि०,२/६/१६०/१, रा०वा०२/६/८/१०९/२९, रा०वा०, 2/10/5/125/ ८रा०वा०,२/१०/५/१२५/१०,१०,१/१.१.१२४/३७४/३; प्र०सा०१९७,१९८, 5. जाणतो पस्संतो ईहापुव्वं ण होइ केवलिणो / -नियमसार 172. तथा केवलिनां स्थानादयोऽबुद्धिपूर्वका एव दृश्यन्ते। -प्र०सा०,ता०वृ० 44.
SR No.035321
Book TitleDev Shastra Aur Guru
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherAkhil Bharatvarshiya Digambar Jain Vidwat Parishad
Publication Year1994
Total Pages101
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size61 MB
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