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________________ (१५२ ) तवारिख-ओशियानगरी. र्थकर रिषभदेव भगवानकी मूर्तिये दोदोहाथवडी राजासंपतिकी तामीर किइहुइ जायेनशीनहै, यहमूर्तियेभी संवत् (१०३३ ) में जबकि-मंदिरका जीर्णोद्धार हुवाथा वेठाइगइहै, मंदिरकी परकम्मामें बावन जिनालयका हकबनाहुवाहै, मगर इसवख्त ( ४ ) जिनालयोंमें मूर्ति बाकीरहगइ. तीनजिनालय बिल्कुल खालीपडेहै, मंदिरकेसामने निहायतपुख्ता सभा मंडप बनाहुवा और उसकीदिवारमें देढहाथलंबा-सवाहाथचौडा-शाहरंगपथरपर एक शिलालेख लगाहै, और उसमेंलिखाहै संवत् (१०३३ ) में-यहलेख यहां लगायागया, सवमीलकर पंक्ति (२८ ) है और उसमें तीर्थकर रिषभदेव और महावीर स्वामीकी तारीफबयान किइगइहै, आगे परिहार वंशका जिक्र-और-वत्सराजाका नाम-जिसने एकदफे ओशियानगरीको-घडीआफतसे वचाइथी, दिगर मतलव हौके घीसजानेकी वजहसे पढानहीजाता, वडीमुश्किलसें इतनापढागया जो उपर दर्जकरचुके, ___ मंदिरकी मेहराबपर वायीतर्फकेखंभेमें लिखाहै संवत् (१०३४) आशाढसुदीदसमी-आदित्यवार स्वातिनक्षत्रकेरौज इसतौरणकी प्रतिष्टा किइगइ, तौरण पथरकाबनाहुवा और उसपर आठपदमासन जिनमूर्ति-चारकायोत्सर्ग ध्यानमय-और फिर चारपदमासन इसतरहकुल्ल (३२) मूर्तियें बनीहुइहै, मंदिरकी शिल्पकारीको देखकर अछेअछे शंगतराशभी तारीफकरते है, शिखर इसकदर उमदा बनाहै जो दुसरीजगह हर्गिज ! न-देखोंगे, जमानेहालमें मरम्मत मंदिरकी चलरही है, रंगमंडपकाफर्सकाले औरसफेद संगमर्मरका इसकदर उमदाबनाहै गोया! एकगालिचा बिछादियाहो. पुरानाडुटीहुई मूर्तियोंके ऊपर जहांकहीं जोडलगायाहे पुरानी और नयीकारीकाफर्क साफ नजरआताहै, जोकोइश्रावक तीर्थोंमें दौलत सर्फकरनाचाहै ऐसेतीर्थोमेंकरे, यहांपरपुरानेमंदिर और मकानात Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034925
Book TitleKitab Jain Tirth Guide
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages552
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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