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________________ कन्वैलेरिया मैजेलिस २०७७ कपर्दिकेश्वर लेरिया मैजेलिस से प्राप्त होता है और डिजिटेलिस | कपड़गन्ध-संज्ञा स्त्री० कपड़ा जलने की गन्ध । वत्र की तरह हृदय बलदायक ( Cordiac tonic ) है । का गन्ध । कपड़छन, कपड़छान -संज्ञा पुं० [हिं० कपड़ा + छानना ] किसी पिसे हुये चूर्ण को कपड़े में छानने का कार्य । मैदे की तरह वारीक करना । वस्त्रपूतकरण । मात्रा - 1⁄2 से १ ग्रेन । कन्वैलेरिया मैजेलिस - [ ले० _ convallaria majalis ] एक ओषधि | कन्वैलेरीन-[ श्रं० convallarine ] एक प्रकार का ल्युकोसाइड जो कन्वैलेरिया मैजेलिस नामक बेल से निकाला जाता है । यह तीव्र रेचक है । मात्रा - ३ से ४ ग्रेन तक । वि० कपड़े से छाना हुआ मैदे की तरह महीन | कप मट्टी - संज्ञा स्त्री० [हिं० कपड़ा + मिट्टी ] धातु वा श्रधि फूकने के संपुट पर गीली मिट्टी के लेप के साथ कपड़ा लपेटने को क्रिया । कपड़ निट्टी | कोटी। कपरौटी । मुत्पट | गिल हिकमत | कपड़ौटी - संज्ञा स्त्री० दे० "कपड़ मिट्टी” । कपथाचक - [ ? ] सुरंजान । कपन -संज्ञा पु ं० [सं० पु० ] ( १ ) कंपन । कँपकपी । घुणादि कीट । घुन श्रादि कीट कपना -संज्ञा स्त्री० [ वै० स्त्री० ] कीट । कीड़ा । कपरौटी - संज्ञा स्त्री० दे० " कपड़ौटी" | कपर्दिका रस -संज्ञा पुं० [सं० पु० ] मृत या मूच्छित पारद को नर्मा के फूल के रस में एक दिन खरल कर कौड़ियों में भर कर उनका मुख बन्द कर देवें । फिर अन्धभूषा में रख गजपुट की श्राँच दें। जब स्वांग शीतल हो जाय. निकाल कर दूनो काली मिर्च मिलाकर बारीक पीसें । मात्रा - १ रत्ती । गुण तथा प्रयाग - प्रातःकाल घी के साथ खाने से रक्तपित्त का नाश होता है । इसे नील कमल, मिश्री, कमज केशर के साथ खाकर ऊपर से चावल का पानी पीने से अत्यन्त लाभ होता है · वृहत् रस रा० सु० रक्त पित्त चि० । कपर्दिकाक्ष-संज्ञा पु ं० [सं० पु० ] बड़ा बगला | काचाक्षपती | कन्हेर - संज्ञा पु ं० [ चम्ब०, गु० ] कनेर । कन्हिल - [ लेप० ] वकलो | भौंरा | सिद्ध । कन्हैया-संज्ञा पु ं० [ देरा०, नेपा० ] एक पहाड़ी पेड़ जो पूर्वी हिमालय पर ग्राठ हजार फुट की ऊंचाई पर होता है । खरहर खेनन । कप - वि० [सं० त्रि० ] जलपायी, पानीपीनेवाला । कपट - संज्ञा पु ं० [सं० की ० ] चीड़ा देवदारु | चीढ़ | चीड़ा | गन्धवधु | चिड़ा | रा० नि० ० १ | कपट चीड़ा - संज्ञा स्त्री० [सं० स्त्री० ] चीढ़ | चीड़ा नामक देवदारु । रा० नि० व० १२ । कपटा - संज्ञा पुं० [हिं० कपटना ] एक प्रकार का कीड़ा जो धान के पौधों में लगता है। संज्ञा स्त्री० [सं० [स्त्री० ] ( १ ) स्व बृहती, छोटी कटाई । ( २ ) लक्ष्मणा । नि० शि० । कपटिनी - संज्ञा स्त्री० [सं० स्त्री० ] चीढ़ । चीड़ा नामक गंध द्रव्य वा देवदारु । रा० नि० व० १२ | कपटी -संज्ञा स्त्री० [सं० स्त्री० ] एक प्रकार की माप । एक नाप । श० २० इसमें २ श्रञ्जलि परिमित द्रव्य श्राता है । संज्ञा स्त्री० [हिं० कपटना ] ( १ ) धान की फसल को नष्ट करनेवाला एक कोड़ा । दे० "कपटा" । (२) एक रोग जो तमाखू के पौधों में लगकर उन्हें नष्ठ कर डालता है । इसे "कोढ़ी" वा कौड़ा भी कहते हैं । कपटेश्वरी -संज्ञा स्त्री० [सं० स्त्री० ] ( १ ) सफेद भटकटैया । श्वेत कण्टकारी । रा० नि० व० ४ | लक्ष्मणा । नि० शि० । ( २ ) ह्रस्व वृहती । वै० निघ० । छोटी कटाई | कपर्दिकेश्वर - संज्ञा पु ं० [सं० पु ं० ] पारा १ मा०, गंधक १ मा० दोनों की कजली कर एक बड़ी पीली कोड़ी में भरें । पुनः कौड़ी के मुँह को भूने सुहागे को पिट्ठी से बन्द कर सरवा
SR No.020062
Book TitleAayurvediya Kosh Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamjitsinh Vaidya, Daljitsinh Viadya
PublisherVishveshvar Dayaluji Vaidyaraj
Publication Year1942
Total Pages716
LanguageGujarati
ClassificationDictionary
File Size24 MB
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