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________________ छन्दशतक। ९९ ARMA wwwwwwwwwwwww चौबोला ( मात्रा ३०) जाको सुनत मुदित मन भविजन, उदित होत चित चेत लहै । * हेयज्ञेय अरु उपादेय पहिचानि 'वृंद' निजरूप गहै ॥ सुरगमुकत पदवीको पावै, रागदोषमदमोह दहै। | ऐसो हितमित दोषरहित नित, मुनिवर सांचौ बोल कहै ॥ त्रिभंगी (जगनवर्जित मात्रा ३२) जो सात सुभंगी, विमल तरंगी, भंग अमंगी, सुखसंगी। 4 ताके अनुसार, तत्त्व विचारे, मोह निवार, बहुरंगी॥ । तिहुँ रतन अराधे, अनुभव साथै, त्यागि उपाधै, मन चंगी।। 4 सत्तादि त्रिभंगी, सो करि भंगी, होत सुरंगी, शिवसंगी॥ षट्पद ( सर्व मात्रा १५२) जासु रुचिर छवि देखि, देखि जब त्रपति न पावत । सुरपति विस्मित होत, नैन तब सहस बनावत ॥ जासु पंचकल्यान, जगतकहँ सुख उपजावत । गुन अनंत भंडार, कहत कोउ पार न पावत ॥ शतइंद्रवृंद वंदत जिसे, सेवत है मन मोद घर । * सो श्रीजिनचरनसरोजसों, भोमन षट्पद प्रीति कर ॥८५॥ पुनः षट्पद । जो जग मंगलमूल, रमा जासों अनुरागी। जाको ध्यावत भाव-सहित मुनिवर बड़भागी॥ इंद्रवृन्द नागिन्द्र, जासकी सेवा साजत । जाहीके परभाव, अमंगल ततखिन भाजत ॥
SR No.010716
Book TitleVrundavanvilas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Hiteshi Karyalaya
Publication Year
Total Pages181
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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