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________________ २० रत्नत्रय विधान वीर ) बिना मूढ़ता नष्ट किए सम्यक्त्व नहीं होता है शुद्ध । देवमूढ़ता गुरुमूढ़ता लोकमूढ़ता घोर अशुद्ध ।। ये तीनों मूढ़ता त्यागकर बनूँ अमूढदृष्टि उत्तम । भलीभाँति से करूँ परीक्षा लोकमूढ़ता नहीं उत्तम ||१|| ॐ ह्रीं श्री देवगुरुलोकमूढ़तारहितसम्यग्दर्शनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा । (दोहा) सम्यग्दर्शन के प्रभो, दोष त्याग पच्चीस । पूर्ण अर्घ्य अर्पण करूँ, जय-जय हे जगदीश ।। ॐ ह्रीं श्री पंचविंशतिदोषविरहितसम्यग्दर्शनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा । महार्घ्य ( ताटंक ) सम्यग्दर्शन की महिमा है वचन-अगोचर अपरम्पार । औपशमिक, क्षायोपशमिक, क्षायिक यह होता तीन प्रकार ।। १ ।। सात प्रकृति कर्मों की उपशम हों तब उपशम होता है। छह का उदयभावी क्षय इक उदय क्षयोपशम होता है ॥२॥ इन्हीं सात का क्षय होता जब तब यह क्षायिक होता है। सम्यग्दर्शन सदा निसर्गज या कि अधिगमज होता है ||३|| आत्मीय निश्चय होता है व्यवहार पराश्रित होता है। जो कुछ भी होता है वह केवल निजबल से होता है ||४|| ( दोहा ) महाअर्घ्य अर्पण करूँ, हो समकित की प्राप्ति । निज अनुभवरस शुद्ध की, हो अंतर में व्याप्ति ।। ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनाय अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा । जयमाला ( मानव ) समकितयुत अल्प तपस्या भी उत्तम फल देती है । समकित बन गहन तपस्या तो भवदुःख फल देती है । । १ । । ज्यों जलबिन खेती करना तो पूर्ण व्यर्थ होता है समकितबिन पुण्यक्रिया का भी नहीं अर्थ होता है || २ || । 11 श्री सम्यग्दर्शन पूजन २१ समकितयुत पुण्यभाव से ही अर्थकाम मिलता है। होता है आत्मबोध भी चारित्रकमल खिलता है ||३|| अबतक जो सिद्ध हुए हैं वे सब समकित के बल से । जो भी भविष्य में होंगे वे भी समकित के बल से ||४|| समकित से ही होती है उपलब्धि शाश्वत सुख की । सामर्थ्य न हो समकित की तो चहुँगति मिलती दुःख की ॥५॥ तत्त्वों की श्रद्धा को ही व्यवहार सुसमकित कहते । निज आत्मतत्त्व श्रद्धा को निश्चय समकित गुण कहते || ६ || होती है मुक्तिसंपदा विकसित समकित के द्वारा । है समयसाररसपूरित सम्यग्दर्शन की धारा ।।७।। अष्टांग शुद्धसमकित ही उर में विशुद्धता लाता । संसारजन्य दुःखरूपी ज्वाला को यही बुझाता ।। ८ ।। सम्यग्दर्शन की धारा ही जन्म-मरण दुःख हरती । स्वात्मोपलब्धि पाता जिय उर में अनंत सुख भरती ।। ९ ।। सम्यक् स्वदृष्टि होती है तो पतन नहीं होता है। मोहादि विकारीभावों का पूर्ण शमन होता है ।। १० ।। है मूलज्ञानलक्ष्मी का निर्दोष चरित्र सुदाता । जो समकित पा लेता है वह रत्नत्रयनिधि पाता ।। ११ ।। जब काललब्धि आती है स्वयमेव निकट आता है। पापों से रहित बनाता संवेग हृदय भाता है ।।१२।। पुरुषार्थसाध्य निजश्रद्धा ही समकित उर लाती है। निजपरिणति रमणीया ही चेतनमन को भाती है ।।१३।। जय हो सम्यग्दर्शन की जय हो निज आनंदघन की । जय महाशील गुणधारी मुनियों के पावन घन की । । १४ । । ( वीर ) सम्यग्दर्शन की पूजन का फल पाऊँ सम्यग्दर्शन । स्वपरविवेक ज्ञान उर लेकर पाऊँ दृढ़ चारित्रसदन ।। रत्नत्रयमंडल विधान की पूजन का है यह उद्देश । निश्चय पूर्ण देशसंयम ले धारूं दिव्य दिगंबरवेश ।। पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् । 卐
SR No.008373
Book TitleRatnatray mandal Vidhan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRajmal Pavaiya Kavivar
PublisherAkhil Bharatiya Jain Yuva Federation
Publication Year2005
Total Pages73
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, Ritual, & Vidhi
File Size280 KB
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