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श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र का मुखपत्र
श्रृत सागर
आशीर्वाद : राष्ट्रसंत जैनाचार्य श्रीपद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. अंक : ३ वैशाख वि. सं. २०५२, अप्रैल १९९६
प्रधान संपादक : मनोज जैन
संपादक : डॉ. बालाजी गणोरकर
ज्येष्ठ वदि-३ स्वर्गारोहण दिवस के अवसर पर
योगनिष्ठ शासन प्रभावक आचार्य श्री बुद्धिसागरसूरीश्वरजी
- डॉ. रितेन्द्र वी. शाह आज से कुछ वर्षों पूर्व देशभक्त पं.लोकमान्य तिलक का एक वाक्य पढ़ने में आया . उन्होंने लिखा था कि यदि मुझे पता होता कि आप 'कर्मयोग' लिख रहे हैं , तो मैं अपना कर्मयोग लिखने की चेष्टा ही न करता. प्रस्तुत वाक्य योगनिष्ठ आचार्यवर्य श्री बुद्धिसागरसूरीश्वरजी महाराज को लिखा गया था. जिसको पढ़कर मेरे मन में आचार्यश्री का कर्मयोग पढ़ने की इच्छा
हुई थी तथा आचार्यश्री के जीवन एवं कार्य के प्रति जिज्ञासा पैदा हुई. जैसे-जैसे मैं आचार्यश्री काठमांडु (नेपाल) में प्रथम निर्मित महावीरालय का दृश्य के जीवन के विषय में जानकारी प्राप्त करता गया उनकी महानता एवं प्रभावक्ता का चित्र
स्पष्ट होता गया.भक्ति भाव से मेरा मस्तक झुक गया.ऐसे महान आचार्यश्री के जीवन के एक राष्ट्रसंत आचार्यश्री पद्मसागरसूरीश्वरजी का दो प्रसंगों की चर्चा यहाँ उपयुक्त होगी. उत्तराखण्ड में विहार
____ जब समाज के ऊपर अनेक कुरिवाजों एवं गलत मान्यताओं का गहन अन्धकार छाया
हुआ था तब गुजरात के विजापुर नामक छोटे से कस्बे में एक दिव्य ज्योति का उदय हुआ, प.पू. राष्ट्रसन्त, आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म.सा. आदि ठाणा कलकत्ता जिनका नाम बहेचर रखा गया. बहेचर बचपन से ही निडर, पराक्रमी, तीव्र-बुद्धि एवं से भव्य चातुर्मास पूर्ण कर के शिखरजी तीर्थ का 'छ'री पालित संघ तथा शिखरजी | प्रतिभाशाली था. अतः कई लोगों ने भविष्यवाणी की थी कि यह लड़का आगे चलकर बहुत में शताधिक जिन मूर्तियों की अंजनशलाका एवं प्रतिष्ठा आदि भव्य रूप से करवा | बड़ा योगी बनेगा. स्वयं पटेल ज्ञाति में जन्मे थे तथापि साधुजनों की संगति से जैनधर्म के प्रति कर क्षत्रिय कुंड तीर्थ पधारे. वहां पर लछवाड़ तथा आस-पास के गांवों के अन्य अनुरागी बन गए.धीरे-धीरेजैन धर्म के सिद्धान्तोंको जानने की जिज्ञासा हुई.अतःजैन पाठशाला जाति के लोगों ने खूब भव्य सामैया किया जिसमें करीबन ३ हजार से अधिक में जाकर नमस्कार महामन्त्र एवं प्रतिक्रमण सूत्र आदि का अभ्यास किया. किन्तु इतने से उनको लोग थे. क्षत्रिय कुंड तीर्थ पहाड़ के ऊपर वहाँ के आदिवासी लोगों ने देशी वाजिंत्र सन्तोष न हुआ. उनका मन तो धर्म के गूढ तत्त्वज्ञान एवं रहस्यों में लगा हुआ था. अपनी इच्छा के साथ ५०० से ६०० की संख्या में नाचते-गाते हुए आचार्यश्री का सामैया किया. पर्ति के लिए वे महेसाणा स्थित जैन संस्कृत पाठशाला में अध्ययन हेत गए.वहाँ अल्प काल में जिलाधीश महोदय की हाजरी में एक बड़ी सभा का आयोजन लछवाड़ वालों ने
ही जैनधर्म के मूलभूत सिद्धान्तों का ज्ञान प्राप्त कर लिया और अध्यापन कार्य में लग गए. किया, जिसमें अभिनंदन पत्र आचार्यश्री को अर्पण किया गया.
अध्यापन कार्य करते-करते आध्यात्मिक भावना का उदय हुआ. अध्यापन कार्य छोड़कर मुनि पूज्य आचार्यश्री वहां से गुणियाजी तीर्थ पधारे, वहां पर भी तीर्थ की ओर
श्री सुखसागर जी महाराज केपास जाकर असार संसार का त्याग कर परम पावनकारी भागवती से खूब भव्य स्वागत किया गया. फिर पावापुरीजी पधारे, वहां पर तीर्थ की कमेटी
दीक्षा अंगीकार की. अब उनकी साधना प्रारम्भ हुई जो जीवन के अन्त तक चलती की ओर से भव्य सामैया किया गया, जिसमें हाथी-घोड़े व बेंड के साथ सारे गांव
रही.आत्मसाधना में लीन होते हुए भी वे समाज के कल्याण के प्रति सजग थे. की जनता हाजिर थी. उस दिन पूरे गाँव को सजाया गया था.
उस समय लौकिक पर्व के दिनों में अन्य धर्म में बलि चढ़ाई जाती थी. लोग पशुओं की उपस्थित विशाल जनसमूह को सम्बोधित करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि भगवान महावीर केवल जैनियों के ही नहीं बल्कि पूरी मानवता के प्रतिनिधि थे.
बलि को धर्म मानते थे. ऐसी हिंसक क्रिया के कारण असंख्य निर्दोष प्राणियों की हत्या होती वे लोकोत्तर पुरुष थे, जिन्होंने सम्पूर्ण मानवता के उद्धार के लिये अपना जीवन
थी. इतना ही नहीं ऐसे क्रूर कर्म को राज्याश्रय मिला हुआ था. राजा भी प्रस्तुत हिंसा में भाग अर्पण कर दिया. उन्होंने कहा कि आज देश और दुनिया में शांति और सुव्यवस्था
लेते थे. इस पशु हिंसा से आचार्यश्री का हृदय द्रवित हो उठा. उन्होंने पशु हिंसा को रोकने का कायम करने के लिए भगवान महावीर के सत्य, अहिंसा, अस्तेय एवं अपरिग्रह के
निश्चय किया. एक बार वे वड़ोदरा में थे. आचार्यश्री के पास विद्या प्रिय राजा सयाजीराव संदेश को न केवल प्रचारित करने की वरन इन आदों को जन-जन के जीवन में | गायकवाड़ आते थे और धर्म चर्चा आदि करते थे.आचार्यश्री के ज्ञान एवं आचार से प्रभावित उतारने की आवश्यकता है.
होकर राजा ने उन्हें अपने महल में प्रवचन हेतु आमन्त्रित किया, तब आचार्यश्री ____ आपने कहा कि पावापुरी की मिट्टी बड़ी पवित्र है जहाँ भगवान महावीर ने उक्त पशुहिंसा की बात कही और उसको स्थगित करने की प्रेरणा की. आचार्यश्री ने अपना अंतिम उपदेश दिया और यहीं पर निर्वाण भी प्राप्त किया. अधिक से का प्रभाव अद्भुत था. उनकी बात सुनते ही राजा ने पशुहिंसा रोकने का आदेश अधिक तीर्थंकरों की जन्म, कर्म और निर्वाण भूमि होने का सौभाग्य भी बिहार दे दिया. इस प्रकार आचार्यश्री ने बहुत बड़ी पशुहिंसा सदा के लिए बंद करवा [शेष पृष्ठ २ पर दी.
[शेष पृष्ठ २ पर
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श्रुत सागर, वैशाख २०५२
पृष्ठ १ का शेष] राष्ट्रसंत का विहार... (सम्पादकीय
को ही प्राप्त हुआ है. भगवान महावीर ने जनमानस की भावना को समझा और मान्यवर श्रुतभक्त!
उनकी मातृभाषा 'मागधी' में ही उपदेश दिया. इसी पावापुरी में उन्होंने अपने आपके हाथों में श्रुतसागर का तृतीय अंक प्रस्तुत हैं. इस बीच सामग्री के चयन अंतिम उपदेश में यह भी कहा है कि जीवन मृत्यु का प्रवेश द्वार है और मृत्यु का एवं प्रस्तुतीकरण में यथेष्ट परिवर्तनकर पत्रिका रोचक बनाने का प्रयास किया गया विसर्जन धर्म साधना से ही संभव है. मनुष्य स्वयं को समझने का प्रयास नहीं करता. है. इस बार जैन धर्म के दो मनीषियों शासन प्रभावक, योगनिष्ठ आचार्यश्री | जिस जीवन को प्रकाशमय होना चाहिए आज वह राग, द्वेष, क्रोध आदि का शिकार बुद्धिसागरसूरीश्वरजी म.सा. तथा उनकी परंपरा में प.पू.गच्छाधिपति आचार्यश्री | हो रहा है. धन-संपत्ति आदि कितनी भी भौतिक उपलब्धियाँ इकट्ठी कर ली जाय कैलाससागरसूरीश्वरजी म.सा.की पुण्य तिथियों (क्रमशः ज्येष्ठ वदि ३ एवं ज्येष्ठ | उनसे संतुष्टि नहीं मिल सकती, शांति नहीं प्राप्त हो सकती. सुदि २) पर उनका संक्षिप्त परिचय देते हुए स्मरणाञ्जलि अर्पित की गई है. | जलमंदिर की पुण्य छाया में पूज्यश्री के अभिनंदन का कार्यक्रम अतिभव्य रहा.
इतिहास के झरोखे से आचार्यश्री हरिभद्रसरिजी का संक्षिप्त परिचय कराया | सभा में ५००० के करीब लोगों की हाजरी थी.आपने प्रवचन में कहा कि भारत गया है। जैन परम्परा में यह मान्यता दृढ़ है कि आपकी कृतियों का अध्ययन किए | को धर्म निरपेक्ष नहीं, बल्कि संप्रदाय निरपेक्ष होना चाहिए. सभी धर्म के लोग । बिना आगमशास्त्रों का रहस्य पाना सम्भव नहीं है...
अपने-अपने धर्म के प्रति वफादार हो जाएँ तो पृथ्वी पर स्वर्ग उतर आएगा. पूज्यश्री आपको यह जानकर परम प्रसन्नता होगी कि प.पू.राष्ट्रसंत आचार्यश्री
ने बड़ी ही मार्मिक वाणी में कहा कि राग और द्वेष रहित व्यक्ति ही महान है. पद्मसागरसूरीश्वरजी म.सा.आदि ठाणा उग्र विहार करते हुए पड़ोसी देश नेपाल
आपश्री ने जनता को दुर्गति से बचने के लिये सप्त व्यसन त्यागने की सलाह दी. की राजधानी काठमाण्डु में पधार चुके हैं। आचार्य श्री भद्रबाहुस्वामी के बाद
उन्होंने कहा कि लोग मुझसे पूछते हैं महाराज आप कौन हैं ? मैं कहता हूँ कि 'मैं
पोस्टमेन हूँ.भगवान महावीर की वाणी-उपदेश एवं दर्शन को जन-जन तक पहुंचाने परम्परागत रीति से विहार कर नेपाल जाने वाले वे ज्ञात प्रथम शासन प्रभावक
आया हूँ. परमात्मा के विचारों और संदेशों को आप तक पहुँचाना मेरा उद्देश्य है. जैनाचार्य हैं. आचार्यश्री ने अभी तक संयम जीवन में ६५,००० मील से ज्यादा
भगवान महावीर ने सम्यक् आचरण को ही मोक्ष माना है. आचार और विचार पदयात्रा की है. आपकी निश्रा में काठमाण्डु में प्रथमबार महावीरालय की शानदार
में जिस दिन एकरूपता आएगी, उसी दिन परमात्मा की प्राप्ति हो जाएगी. उन्होंने प्रतिष्ठा हो रही है. आपश्री की निश्रा में आचार्यश्री कैलासागरसूरि ज्ञान मंदिर,
परमात्मा को अपनी श्रद्धा अर्पित करने के लिए जनता को प्रेरित किया और कोबा अपनी विकास यात्रा के चौथे वर्ष में वैशाख सुदि छठ बुधवार के दिन मंगल
चारित्रिक पतन रोकने की सलाह दी. इस अवसर पर घोषणा की गई कि पावापुरी प्रवेश कर रहा है। ज्ञानमंदिर सहित श्रीमहावीर जैन आराधना केन्द्र की प्रगति
में कन्या विद्यालय तथा जलमंदिर तालाब में घाटों का निर्माण किया जाएगा तथा आप सभी के उदार सहयोग का ही परिणाम है.जैन शासन की सेवा के इस महान ।
| चैत्र एवं कार्तिक मास में सूर्य देव को अर्घ्यदान करने दिया जाएगा. कार्य में आपका तन-मन-धन से अनवरत सहयोग मिलता रहा है और मिलता | आपथीकी निश्रा में पावापुरी जैन मन्दिर प्रांगण में श्रीराजेन्द्र सूरिजी की स्मृति रहेगा, ऐसी कामना है. आपके सुझावों एवं प्रतिक्रियाओं को हम सादर आमंत्रित में निर्मित आराधना भवन का उद्घाटन हुआ. यहाँ उपस्थित विशाल जनसमूह करते हैं.
को सम्बोधित करते हुए उन्होंने जैन-दर्शन की महत्ता और व्यापकता पर प्रकाश
डाला. पृष्ठ १ का शेष योगनिष्ठ आचार्य श्री... आचार्यश्री की ज्ञानसाधना आजीवन चलती रही.एक संस्था जितना काम करती है उतना |
दूसरे दिन पावापुरी ग्रामवासियों की ओर से अभिनंदन का कार्यक्रम भी
| उल्लेखनीय रहा. ग्रामवासियों ने पू. आचार्यश्री की प्रेरणा से पावापुरी तीर्थ क्षेत्र काम अकेले आचार्यश्री ने किया है, अपने २४ वर्ष के साधुजीवन में उन्होंने एक सौ आठ से
में मांस-शराब आदि का सेवन बंद कर दिया. होली के प्रसंग पर गांव में एक भी भी अधिक ग्रन्थों की रचना की और प्रकाशित करवाए, जो अपने आप में बहुत बड़ी सिद्धि
पशु-हिंसा नहीं हुई और न ही एक बोतल शराब भी बिका. प्रवचन का चमत्कार है. उनका जीवन ज्ञान एवं ध्यान की साधना में ही व्यस्त रहा . वे अपने पास कागज एवं पेंसिल
ऐसा हुआ कि पूरे गांव के लोगों के हृदय बदल गये. ग्रामवासियों ने तथा ट्रस्टी रखते थे. प्रतिदिन चिन्तन करके उसे लिखने का कार्य करते थे, इतना अधिक लिखते थे कि
लोगों ने एक चातुर्मास पावपुरी में करने की आग्रह पूर्ण विनती भी की. वहाँ से एक दिन में दो-तीन पेंसिलें समाप्त हो जाती थी. उनके ग्रन्थों में आध्यात्मिक, योग, दर्शन एवं
पूज्यश्री राजगिरिजी पधारे, वहां पर भी खूब भव्य स्वागत ट्रस्ट एवं ग्रामवासियों गैद्धान्तिक विषयों की बातें कूट-बूट कर भरी हैं. उन्होंने उच्चकोटि के ग्रन्थों की रचना की है. |
ने किया. श्री जयंतिलाल जैन - मेनेजर की मेहनत, ट्रस्टियों की भावना एवं बिहार साथ ही माथ सामान्य जनोपयोगी साहित्य भी रचा है.
राज्य के भू.पू. शिक्षामंत्री श्री सुरेंद्र कुमारजी 'तरुण' जो कि पूज्य श्री के परमभक्त उस जमाने में शिक्षण प्राप्त करना बहुत कठिन था. गाँव में उच्च शिक्षण की कोई सुविधा | है एवं बिहार में सभी जगह पर उनकी उपस्थिति रही है, उन सबों की सेवा ने नहीं थी और शहर में जाकर पढ़ना सबके वश की बात नहीं थी. अतः कई जैन सामान्य ज्ञान | राजगीरि के कार्यक्रम में अत्यधिक शोभा बढ़ा दी.नागरिक अभिनंदन के दिन सभा . प्राप्त करके ही अध्ययन छोड़ देते थे. समाज की ऐसी परिस्थिति को देखकर उन्होंने पालिताणा, में पूरे नगर के लोग, बौद्ध साधु एवं अन्य संत-महंत-अधिकारी गण की उपस्थिति अहमदावाद और वड़ोदरा में सम्यक् ज्ञान पोषक जैन बोर्डिंगों की स्थापना करवाई. जो आज में खूब शानदार अभिनंदन समारोह का कार्यक्रम संपन्न हुआ. जापान शांतिस्तूप भी अनेक जैन विद्यार्थियों का आश्रय स्थान बने हुए हैं. ऐसे थे आचार्य दीर्घद्रप्टा. के मुख्य बौद्ध आचार्य जो जापान के हैं, उन्होंने पूज्य आचार्य श्री को शांतिस्तूप ___आचार्यश्री का जीवन, उनके कार्य व साधना उच्चकोटि की थी. ऐसे महान आचार्यथी | का प्रतीक (मॉडल) अर्पण किया. पूज्यश्री ने कुंडलपुर के नूतन भव्य जिन मंदिर को कोटि-कोटि वंदन.
की प्रतिष्ठा भी बड़े भव्य रूप से संपन्न की. शेठश्री श्रेणिकभाई कस्तुरभाई आदि
तथा बम्बई-मद्रास-दिल्ली कलकत्ता से जयकुमारसिंहजी-कांतिलालजी श्रीमाल योगनिष्ठ आचार्य श्रीमद् बुद्धिसागरसूरीश्वरजी रचित आध्यात्मिक अमर ग्रन्थों
आदि सेंकडों की संख्या में भाविक लोगों की हाजरी प्रतिष्ठा प्रसंग पर थी. का पूरा सेट प्रत्येक परिवार में संग्रहणीय है,ये ग्रन्थ निम्नलिखित पते पर उपलब्ध हैं -
श्रीगौतमस्वामी की जन्मभूमि पर बना यह मंदिर अति सुंदर व कलात्मक है. नालंदा श्री महुडी (मधुपुरी) जैनश्वेताम्बर मूर्तिपूजक ट्रस्ट
पास में होने से अनेक पर्यटक इस मंदिर के दर्शन का लाभ लेंगे. | पोस्ट-महुडी, ता. विजापुर, जि. महेसाणा
पूज्यश्री का बिहारशरीफ में सुचंती परिवार ने खूब सुंदर सामैया किया. फिर ३८२ ८५५ फोनः (०२७६३८४) ६२६, ६२७
आचार्यश्री का आगमन पटना (पाटली पुत्र) में हुआ. पटना सिटी में भी प्रभावक
[शेष पृष्ठ ३ पर
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श्रुत सागर, बैशाख २०५२
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सुभाषित
मूलाओ बंधणभवो दुमस्स, संधाउ पच्छा समुवेन्ति साहा । साहप्पसाहा विरुहन्ति साहा, तओ सि पुष्पं च फलं रसो य ।। एवं धम्मस्स विणओ, मूलं परमो से मोक्खो । जेण कित्तिं, सयं, सिग्धं, निस्सेसं घाभिगच्छई ।।
1
1
[९-२-१,२ दशवैकालिक सूत्र ] वृक्ष के मूल से स्कन्ध उत्पन्न होता है, स्कन्ध के पश्चात् शाखाएँ और शाखाओं में से प्रशाखाएँ निकलती हैं। इसके पश्चात् फूल, फल और रस उत्पन्न होता है।
इसी प्रकार धर्म रूपी वृक्ष का मूल विनय है, और उसका अन्तिम फल मोक्ष है । विनय से मनुष्य को कीर्ति, प्रशंसा और श्रुतज्ञान आदि समस्त इष्ट तत्वों की प्राप्ति होती है
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जस्संतिए धम्मपवाई सिक्खे, तस्संतिए वेणइयं पउंजे ।
(९-१-१२ दशवेकालिक सूत्र ] जिनके पास धर्म - शिक्षा प्राप्त करे, उनके प्रति सदा विनय भाव रखना चाहिए।
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तम्हा विणयमेसिज्जा, सीलं पडिलभेज्जओ । [१-७ उत्तराध्यायन सूत्र ]
विनय से साधक को शील-सदाचार मिलता है। अत: उसकी खोज करनी चाहिए। O
पृष्ठ २ का शेष ]
राष्ट्रसंत का विहार.... कार्यक्रम रहा एवं पटना जंक्शन में भी खूब भव्य कार्यक्रम आदि रहे.
बिहार पत्रकार संघ की ओर से अध्यक्ष श्री रामजी मिश्र ने अभिनंदन समारोह का सुंदर आयोजन नृत्य कलामंदिर के हॉल में किया. इस कार्यक्रम में पटना के वौद्धिक समाज की अच्छी उपस्थिति रही.
दादावाड़ी भवन का उद्घाटन भी पूज्य आचार्यश्री की निश्रा में हुआ. सर्वश्री ताजबहादुरसिंहजी वेद, प्रदीप कोठारी आदि ने कार्यक्रम को खूब सुंदर रूप दिया. उन्होंने सुदर्शन सेठ की पुण्य भूमि में उनकी चरण पादुका एवं थी स्थूलभद्रजी के चरण पादुका का दर्शन-वंदन भी किया. पश्चात् पू. आचार्यश्री गंगा पुल पार करके हाजीपुर पधारे. जहां पर हाथी, घोड़े ऊंट व पटना के प्रसिद्ध बैंड के साथ पूज्य आचार्यश्री के परिवार वालों ने खूब भव्य सामैया आदि किया. हाजीपुर के प्रतिष्ठित व्यक्ति श्री चंद्रेश्वर प्रसाद सिंहजी ने खूब अच्छा लाभ इस प्रसंग पर लिया. आचार्यश्री के परिवार की जमींदारी इसी वैशाली जिले में थी. आज भी उनके परिवार का इस क्षेत्र में अच्छा वर्चस्व है.
इसके बाद पूज्य आचार्यश्री ने मुजफ्फरपुर- मोतिहारी होकर के वीरगंज (नेपाल) में ३१-०३-९६ को प्रवेश किये. महावीर जन्म कल्याणक वहां पर भव्य रूप से मनाया गया. १२-०३-९६ को नूतन जिनालय की प्रतिष्ठा के काठमांडु में शानदार प्रवेश किया. बड़े महोत्सव के साथ प्रतिष्ठा २५-०४-९६ को सम्पन्न हो रही है.
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जैन साहित्य २
गतांक से आगे]
विविधता व प्राचीनता, भारतीय संस्कृति की विशिष्टता है. विविध धर्म, भाषा एवं पंथों का समन्वय भारतीय संस्कृति में होते हुए भी प्रत्येक धर्म सम्प्रदाय एवं भाषा का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है. जैन धर्म भारतीय संस्कृति का एक विशिष्ट अंग है. इस धर्म का तत्वज्ञान, आचार-विचार एवं साहित्य भारतीय संस्कृति में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है.
जैन धर्म की दृष्टि विश्वव्यापी व अनेकान्तात्मक है. जीवन की सभी आवश्यकताएं एवं भावनाएँ इस ओर ध्यान देती हैं. उसी प्रकार जैन धार्मिक साहित्य
भी विश्वव्यापी व वैविध्यपूर्ण है. यह साहित्य केवल पारमार्थिक या धार्मिक ही नहीं बल्कि लौकिक एवं व्यावहारिक आवश्यकतानुसार भी सजाया गया है. इस समग्र साहित्य का दृष्टिकोण दार्शनिक के साथ ही वैज्ञानिक भी है. साहित्य की ऐसी कोई विधा नहीं है जिस क्षेत्र में या जिस प्रकार में जैन साहित्य का सर्जन नहीं हुआ हो.
जिस प्रकार जैन धर्म विश्व का कल्याण कर्ता और प्राणी मात्र का उद्धारक है, उसी प्रकार उसके साहित्य की भाषा भी विश्वव्यापक होती गई है. जिस-जिस देश में जैन धर्म ने पदार्पण किया है वहाँ पर प्रचलित भाषा में ही ज्ञान दान करने का महत्त्वपूर्ण कार्य जैन साहित्य ने किया है. संस्कृत, प्राकृत, मागधी, अर्धमागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री, गुजराती, राजस्थानी, हिन्दी, तमिल, तेलगू, नन्द इत्यादि
भारत के विभिन्न प्रदेशों में बोली जाने वाली लोकभोग्य भाषाओं में इस साहित्य की रचना हुई है. जैन धर्म का विभिन्न समाजों में प्रचार-प्रसार इस कारण से भी सम्भव हुआ. ज्ञान के सभी क्षेत्रों में जैन धर्म ने अपने दरवाजे खुले रखे हैं.
सभी धर्मों के अपने-अपने मूल आधार ग्रंथ होते हैं जो उनके लिए आदर्श एवं पूजनीय या सबसे अधिक सम्माननीय होते हैं. उसी प्रकार जैन धर्म के साहित्य आगम सबसे प्राचीन, सर्वोत्कृष्ट एवं मूल भूत धर्मग्रंथ हैं. जैन धर्मानुयायियों आगम ग्रंथों के प्रति प्रभूत श्रद्धा विद्यमान है.
जैन धर्म के अनुसार 'प्रत्येक उत्सर्पिणी/अवसर्पिणी काल में २४ - २४ तीर्थंकर होते हैं लेकिन उनके उपदेश में साम्यता होती है. प्रत्येक काल में जिस तीर्थंकर का शासन चलता हो उन्हीं का उपदेश और शासन, विचार और आचार के लिए प्रजा में मान्य रहता है. प्रत्येक चौवीसी में भी प्रथम और अन्तिम तीर्थंकर के शासन में थोड़ी आचार भिन्नता रहती है. शेष २२ तीर्थकरों के काल में एक समानता रहती है. इसी दृष्टि से भगवान महावीर चूंकि २४ वें तथा अन्तिम तीर्थकर रहे, इसलिए उन्हीं का उपदेश अंतिम उपदेश है और वही उनकी परंपरा में प्रमाणभूत माना गया है. अन्य तीर्थंकरों के उपदेश उपलब्ध भी नहीं हैं और यदि हैं तो भी वे भगवान महावीर के उपदेशों में सम्मिलित हो गए हैं.
भगवान महावीर ने जो उपदेश दिए थे उसे गणधरों ने सूत्र बद्ध किया. आवश्यक नियुक्ति (गाथा १९२ ) में इसीलिए बताया गया है कि अर्थोपदेशक या अर्थ स्वरुप शास्त्र के कर्त्ता गणधर हैं. भगवान महावीर ने स्पष्टता कहा है कि उनके उपदेश का संवाद उनके पूर्व के तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के उपदेश से है. शास्त्रों के अनुशीलन से भी ज्ञात होता है कि भगवान पार्श्वनाथ तथा भगवान महावीर स्वामी के आध्यात्मिक संदेश में मूलतः कोई भेद नहीं है.
जैन धर्म में तीर्थंकर प्रणीत वाणी को आगम की संज्ञा दी गई है. इसे श्रुत या सम्यक् श्रुत कहा जाता है. इसी प्रकार स्थविरों की गणना में भी श्रुत स्थविर को स्थान मिला.
आचार्य उमास्वाति ने श्रुत के निम्नलिखित पर्यायवाची नाम उल्लिखित किये है श्रुत, आप्तवचन, आगम, उपदेश, ऐतिह्य, प्रवचन और जिन वचन.
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[क्रमश:
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इतिहास के झरोखे से
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महान् शासन प्रभावश
आचार्य हरिभद्र सूरि : एक परिचय
आचार्य श्री हरिभद्रसूरि जैन धर्म के पूर्वकालीन एवं उत्तरकालीन इतिहास के सीमा स्तम्भ के रूप में सत्य के उपासक, १४ विद्याओं के पारंगत महान जैन दार्शनिक, १४४४ ग्रंथों के रचयिता तथा वृत्तिकार के रूप में सदियों से जाने जाते रहे हैं और युगों-युगों तक उनका नाम स्मरण किया जाता रहेगा.
उनका जन्म चित्रकूट (चित्तौड़) निवासी ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनकी माता का नाम गंगण और पिता का नाम शंकर भट्ट था. भट्ट हरिभद्र प्रखर विद्वान थे जिसके कारण चित्तौड़ के राजा जितारि के यहाँ राजपुरोहित पद पर नियुक्त किये गए थे. उन्हें अपने ज्ञान का बहुत गर्व था. उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि मुझे वाद-विवाद में जो भी परास्त कर देगा उसका शिष्य बन जाऊँगा. एक बार वे एक उपाश्रय के रास्ते से डोली में बैठकर जा रहे थे कि अचानक उनके कानों में यह गाथा पड़ीचक्किदुगं हरिपणगं, पणगं चक्कीण......
एक साध्वीजी संग्रहणी की यह गाथा बार-बार दुहरा रही थी. हरिभद्र ने ध्यान पूर्वक इसका अर्थ जानने का प्रयास किया. लेकिन असफल रहने पर साध्वीजी के पास जाकर कहा कि इस स्थान पर चकचकाहट किस बात की हो रही है? बिना अर्थ के गाथा का पुनरावर्तन क्यों हो रहा है? हरिभद्र की वाणी में वक्रता अधिक थी किन्तु साध्वीजी ने, जो धीर, गंभीर, क्रियाशील, एवं व्यवहार निपुण थी, कोमल शब्दों में कहा कि 'नूतन लिप्तं चिकचिकायते' अर्थात् नूतन लेप किया आंगन चकचकाट कर रहा है. इस सारगर्भित उत्तर को सुनकर हरिभद्र प्रभावित हुए. उन्हें ऐसे जवाब की आशा नहीं थी. उनके मन में आया कि न तो इस गाथा का अर्थ समझ
आया और न ही प्रत्युत्तर का मर्म समझ सका. उन्होंने साग्रह विनती की कि कृपया इसका अर्थ समझाइये अपनी पूर्व कृत प्रतिज्ञा की बात भी उन्होंने साध्वी याकिनि को बताई कि वह उनसे दीक्षा ले लेंगे 'प्रभावक चरित्र' में भी उल्लेख है कि साध्वीजी उसका अर्थ जानती थी लेकिन अपनी मर्यादा का पालन और ज्यादा लाभ उनको प्राप्त हो सके इसलिये उन्हें अपने गुरु आचार्य श्री जिनभद्रसूरिजी के पास अर्थ समझने के लिए भेजा. जैनाचार्य के पास जाकर विवेकशील वाणी से उन्होंने उस गाथा का अर्थ ' पूछा.
अब उनका गर्व खंडित हो चुका था. आचार्य जिनभद्रसूरि ने गाया का अर्थ बताया तब तो हरिभद्र भट्ट का जैन धर्म के तत्वों को जानने की उत्सुकता जागी. तब जैनाचार्य ने कहा कि पूर्वोत्तर संदर्भ सहित जैन सिद्धान्त समझने के लिए मुनि जीवन को स्वीकार करना आवश्यक है. हरिभद्र के ज्ञान की छोर पर जैन दर्शन के तत्त्व ज्ञान की तरंगें लहराने लगी. हरिभद्र ने जैनाचार्य से पूछा भगवन् ! धर्म का फल क्या है ? वैदिक धर्म के एवं जैन धर्म फल में क्या अन्तर है ?
आचार्यश्री ने कहा कि सकाम वृति वाले मनुष्य को धर्म के फलस्वरुप स्वर्ग की प्राप्ति होती है और निष्काम वृति वाले को 'भव विरह' याने संसार से मुक्ति अर्थात मोक्ष मिलता है. जैन धर्म इसी संसार से मुक्ति का मार्गमोक्ष का मार्ग दिखलाता है. हरिभद्र को यह उत्तर तर्कपूर्ण एवं सत्य प्रतीत हुआ और अपनी प्रतिज्ञानुसार उन्होंने जैन वाङ्गमय एवं उसके फल स्वरूप को अंगीकार करने के लिए श्रमणत्व स्वीकार किया. वे जैन मुनि
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बन गए. उन्होंने साध्वी याकिनि महत्तरा को अपनी धर्म माता के रूप में स्वीकार कर अपने परिचय के रूप में ज्यादातर कृतियों के अन्त में 'महत्तरा याकिनि धर्म सूनु' शब्द का उल्लेखकर अपनी धर्म माता के उपकार को अमर बना दिया. वे वेदादि १४ विद्याओं के पारंगत तो थे डी. उनमें जैन शास्त्रों के वस्तु तत्त्व को सर्वग्राही दृष्टिकोण से देखने की वृत्ति जागृत हो उठी, उनके हृदय में जैन धर्म के प्रति अनुराग बढ़ने के साथ ही जैन तत्व ज्ञान व अनेकांत दृष्टि की उत्कृष्टता बस गई. श्रमण जीवन के पवित्र आचारों का पालन करते हुए वे आचार्य पद के योग्य हुए तब उन्हें आचार्य जिनभद्रसूरि ने आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया.
आचार्य बन कर हरिभद्रसूरिजी ने जैन शासन की अभूतपूर्व सेवा की. उन्होंने सर्व दर्शनों के सिद्धान्त रहस्यों को अपने हृदय में आत्मसात् कर ज्ञान की निर्मल धारा प्रवाहित की, जिससे आज तक अनगिनत जिज्ञासु भव्य जन अपनी ज्ञान तृषा शान्त कर रहे हैं. कहा जाता है कि हरिभद्रसूरि के ग्रंथों के परिचय के बिना जिनागमों का हार्द नहीं समझा जा सकता. अनेकान्तवाद की समन्वयपूत दृष्टि से उन्होंने जैन श्रुतज्ञान निधान प्रत्यक्ष कर लिया था.
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आचार्य हरिभद्रसूरिजी के संसारी भांजे हंस और परमहंस नामक दो शिष्य भी थे. दोनों ही व्याकरण, साहित्य एवं दर्शन के विद्वान बन गए थे. उस समय बौद्ध दर्शन की प्रबलता थी. राज्याश्रय के कारण बौद्ध दर्शन का प्रसार एवं प्रभाव जैन समुदाय में बड़ी शीघ्रता से हो रहा था. बौद्ध दर्शन के अभ्यास के बिना बौद्धों का खंडन करना सम्भव नहीं था. अतः हंस और परमहंस ने आचार्य हरिभद्रसूरि से आशा मांगी कि वे दोनों बौद्ध विद्यापीठ में जाकर अध्ययन कर सकें. निमित्त शास्त्र के ज्ञाता आचार्य हरिभद्रसूरि ने भवितव्य को जानकर अनुमति नहीं दी, लेकिन वे दोनों नहीं माने और भवितव्यतावश बौद्ध भिक्षु का वेश धारणकर बौद्धदर्शन का अभ्यास करने निकल पड़े. विद्वान होने के कारण उन्होंने बौद्ध धर्म के मर्म पर अपना ध्यान केन्द्रित किया और थोड़े समय में ही रहस्य ग्रन्थों at कण्ठस्थ कर लिया. वे समयानुकूल जैनदर्शन शैली से बौद्ध दर्शन का खण्डन लिख भी लेते थे. एक दिन उनमें से एक पत्र किसी बौद्ध भिक्षु के हाथ लग गया और बात खुल गई कि यहाँ कोई जैन रह रहा है. बौद्ध आचार्य ने बड़ी कुशलता से भेद पा लिया और हंस व परमहंस पहचान लिए गए. अतः वे दोनों वहाँ से प्रस्थान कर गए. मार्ग में यातनावश हंस का प्राणांत हो गया, किसी प्रकार परमहंस ने समीपवर्ती नगर में जाकर सूरपाल नामक राजा की शरण ली. बाद में बहुत 'कष्टों को सहन करते हुए आचार्य हरिभद्रसूरिजी के चरणों में उपस्थित हुए और अपने अविनय के लिए क्षमा माँगकर समाधि पूर्वक काल धर्म को प्राप्त हुए. आचार्य हरिभद्र सूरि जी को इस बात का बड़ा दुःख हुआ, उन्होंने बौद्धों को शास्त्रार्थ में परास्त करने की प्रतिज्ञा की सूरपाल राजा के यहाँ बौद्ध आचार्य हरिभद्रसूरि के मध्य शास्वार्य हुआ. इसके पूर्व दोनों की सम्मति से यह तय हुआ था कि जो पराजित होगा उसके पक्ष के व्यक्ति अतिशय गर्म तेल में जल कर मर जायेंगे.
सूरपाल राजा की सभा में कई दिनों तक वाद-विवाद चलता रहा. अन्त में अपने अद्भुत तर्क सामर्थ्य और असाधारण ज्ञान बल से आचार्य हरिभद्रसूरिजी विजयी हुए. इधर इसी समय हरिभद्रसूरि के गुरुवर जिनभद्रसूरि को इस घटना का पता लगा और तुरंत उन्होंने कोपाविष्ट अपने शिष्य के प्रतिबोध हेतु तीन गाथाएँ लिख भिजवाई इनमें गुणसेन [शेष पृष्ठ ५ पर
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श्रुत सागर, वैशाख २०५२ पृष्ठ ६ का शेष आचार्य हरिभद्रसूरि..... और अग्निशर्मा के भवों की घटनाएं संकलित थी जिनका तात्पर्य था कि
(ग्रंथावलोकन) "वैर का अनुबंध भव-भवान्तर तक चलता रहता है अतएव क्रोध उचित है?" आचार्य हरिभद्रसूरि का क्रोध इन गाथाओं को पढ़ने से शांत
भीमसेन चरित्र षड्रस से परिपूर्ण उत्तम चरित्र ग्रंथ है. इसमें आत्म-तत्त्व हो गया और अपने क्रोध (कषाय) के प्रायश्चित्त स्वरूप अपनी शिष्य संतति की प्राप्ति हेतु भव निर्वेदकारक व अनेकानेक आत्म-गुण पोषक तथा दुर्गुण शोषक के स्थान पर उन्होने ज्ञान संतति के विकास की ओर ध्यान केन्द्रित किया.
कास की ओर ध्यान केन्द्रित किया. भाव बहुत ही सहजता से प्रस्तुत किये गए हैं. अपने कषाय की उपशान्ति होते ही प्रायश्चित के रुप में उन्होंने १४४४ प्रस्तुत ग्रंथ में नीति,न्याय, परोपकार,सेवा, सदाचार,क्षमा,तप, शील, आदि ग्रंथ निर्माण करने की प्रतिज्ञा ली थी, तदनुसार ज्यादातर ग्रंथों की रचना | आदर्शों का यत्र तत्र प्रसंगोपात दर्शन होता है. कर डाली किन्तु अपने मनुष्य जीवन का मर्यादित समय जानकर शेष ग्रंथों । इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं कि द्रव्यानुयोग, चरणकरणानुयोग, गणितानुयोग के सृजन में वे दिन-रात व्यस्त रहने लगे.
एवं धर्मकथानुयोगमय स्वयंभूरमण समुद्र तुल्य गहन सागर में श्रुत ज्ञान से बाल ___ ग्रन्थनिर्माण का कार्य निरन्तर जारी रहा. परन्तु श्रुतसागर को जीवों पर धर्मकथानुयोग द्वारा सविशेष सुगम उपकार सम्भव है.. ग्रन्थस्थ करना कितना कठिन होता है, वह जानते थे. एक दिन जब वस्तुतः धर्मकथानुयोग, सरस और सुग्राह्य होने से बा।क, युवा, प्रौढ, सभी आचार्यश्री चिन्तामग्न मुद्रा में कुछ सोच रहे थे तब वंदन करने आए उनके | उत्कंठा से पढ़ते हैं. उसमें वीर रस, करुण रस, एवं शांत रस आदि सभी रसों एक श्रावक लल्लिग ने परम विनय से विनती की कि हे गुरु भगवन्त आप | का सुंदर, भावात्मक, हृदयस्पर्शी विवेचन होने के कारण निस्संदेह भव्य जनों के चिन्तित क्यों हैं ? आग्रहवश आचार्यश्री ने बताया कि मेरा आयुष्य | लिए उपयोगी सिद्ध होता है. भीमसेन चरित्र में ये सभी गुण विद्यमान है. जलबिन्दुवत् है और मैं इतने विशाल श्रुत ज्ञान को ग्रन्थस्थ कैसे कर इस ग्रंथ में वर्णित कल्याणदायी धर्मकथा का श्रद्धा भाव से श्रवण, मनन और पाऊँगा? यह सोचकर मुझे चिन्ता हो रही है क्योंकि सूर्य प्रकाश में ही | अनुशीलन किया जाय तो हिंसा, असत्य, चौर्य आदि पापाचरणों के फलस्वरुप यह प्रवृत्ति होती है, जो बिल्कुल मर्यादित है. आचार्य भगवन्त की निःस्वार्थ | संसारवर्धक कषायादि अशुभ परिणाम नष्ट होते हैं तथा अहिंसा, सदाचार आदि वेदना का रहस्य पाते ही लल्लिग ने कहाः भगवन्त आप इस चिन्ता को | के फलस्वरूप एकांतिक आत्महितकारी परिणामों की प्राप्ति होती है. परिणामशुद्धि छोड़ दीजिये, मैं सब सम्भाल लूँगा, आप अपनी श्रुतआलेखन प्रवृत्ति में जब पूर्ण स्वरूप में विकसित होती है तब जीव शिवपद प्राप्ति का अधिकारी बनता मग्न हो जाईये. उसने अपने पूर्वजों द्वारा संग्रहित अनेक जात्यरत्नों को है. आचार्य के श्रुत कक्ष में खचित कर दिया. ताकि रात दिन एक जैसे ही | भीमसेन चरित्र' का सर्जन संस्कृत एवं गुजराती भाषा में भी स्वतंत्ररूप से रत्नों के स्वाभाविक प्रकाश में ज्ञानाराधन प्रवृत्ति निराबाध चलती रहे. अष्टोत्तरशत ग्रंथ प्रणेता परम शासन प्रभावक योगनिष्ठ आचार्य भगवंत श्रीमद् श्रावक की श्रुत भक्ति गुण की प्रगाढ़ता के इस प्रसंग से पता लगता
| बुद्धिसागरसूरीश्वरजी महाराज के पट्टाधिकारी पूजनीय विद्वान् शिष्यरत्न प्रसिद्ध है कि जैनत्व की प्राप्ति कितनी विवेक पूर्ण होती है.आचार्यश्री
| वक्ता आचार्य श्री अजीतसागरसूरीश्वरजी महाराज ने किया है. गुजराती भाषा हरिभद्रसूरिजी ने अपने जीवनकाल के दान १४४४ ग्रंथ निर्मित किये
समझनेवालों को यह मूल ग्रंथ बहुत ही सरल एवं सुबोध प्रतीत होगा. योगनिष्ठ हैं. उनकी अन्तिम कृति 'संसार दावानल स्तुति थी. जिसकी अन्तिम गाथा |
आचार्य भगवंत की परम्परा में गच्छाधिपति आचार्य श्रीमद् कैलाससागरसूरीश्वरजी लिखते-लिखते आचार्यश्री देवलोक हुए तब उपस्थित श्रावक समुदाय ने
महाराज के प्रशिष्य राष्ट्रसंत प.पू. आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी महाराज की उस अन्तिम (चौथी) स्तुति के शेष तीन चरण रचकर ग्रंथ परिपूर्ण किया. | अर
प्रेरणा से आचार्य श्री अजितसागर सूरीश्वरजी महाराज की कृतियों को प्रकाशित आचार्यश्री के विषय में जैन परंपरागत दंतकथानुसार वे उस समय हुए, |
| करने का यह प्रयास अनुमोदनीय है.. जब चौदह पूर्वमय दृष्टिवाद रूप सूर्य अस्त हो रहा था. उनके कई ग्रंथों |
भीम सेन चरित्र' (मूल) गुजराती का हिन्दी अनुवाद श्री रंजन परमार एवं में वह तत्त्वज्ञान मिलता है जो अन्यत्र कहीं भी नहीं मिल सकता है. पूर्वगत
सुश्री ज्योति बाफना ने बड़ी लगन के साथ इस प्रकार किया है कि हिन्दी पाठकों ज्ञान की छाया उन ग्रंथों पर अवश्य पड़ी है यह निर्विवाद मानना होगा.
को प्रतीत नहीं होगा कि यह किसी ग्रंथ का अनुवाद है. अनुवाद की भाषा अत्यंत अन्यथा ऐसा प्ररूपण नहीं हो सकता. जैन समाज में आचार्यश्री के वचन
क्लिष्ट न होकर सामान्य जनोपयोगी है और कुल मिलाकर ग्रंथ की प्रस्तुति 'टंकशाली' माने जाते हैं. यह उनकी प्रामाणिकता का तथ्यभूत प्रमाण है.
प्रशंसनीय है. आध्यात्मिक जगत का कोई ऐसा विषय नहीं होगा जो उन्होंने बाकी छोड़ा
(सचित्र) भीमसेन चरित्र, मूल (गु.) लेखक : आचार्य श्रीअजीतसागरसूरीश्वरजी
| म. सा., प्रेरक : प. पू. राष्ट्रसंत आचार्य श्रीपनसागरसूरीश्वरजी म. सा. के शिष्य हो. इस प्रकार आचार्यश्री हरिभद्रसूरीश्वरजी की जैन धर्म में अपनी
रत्न गणिवर्य श्री अरुणोदयसागरजी म. सा. हिन्दी अनुवादः रंजन परमार एवं विशिष्ट पहचान हैं. उनकी ग्रंथ रूपी संतति आज के भौतिक युग में इतनी
सुश्री ज्योति बाफना, आवृत्तिः प्रथम, सं. २०५०, मूल्य ४०/%D, प्रकाशकः श्री ही आध्यात्मिक जगत के प्रति सतत क्रियाशील है.
अरुणोदय फाउण्डेशन, कोबा, गाँधीनगर. उनके प्रमुख ग्रंथ निम्नोक्त हैं : योगदृष्टि समुच्चय, लघुक्षेत्र समास, योगशतक, योगविंशिका, श्रावक धर्म, योगबिन्दु, अनेकान्तजयपताका,
पाठकों से नम्र निवेदन अनेकान्तवाद प्रवेश-टिप्पण,शास्त्रवार्ता समुच्चय, द्विजवदन चपेटा,लोक
___ यह अंक आपको कैसा लगा, हमें अवश्य लिखें. आपके सुझावों की हमें प्रतीक्षा है. तत्वनिर्णय, षड्दर्शन, धर्मबिन्दु, सर्वज्ञसिद्धि, षोडशक प्रकरण, धर्मबिन्दु,
आप अपनी अप्रकाशित रचना/लेख सुवाच्य अक्षरों में लिखकर दंकित कर हमें भेज धुर्ताख्यान, समरादित्य कथा, अष्टक प्रकरण, उपदेशपद, पंचवस्तु, |
" | सकते हैं. अपनी रचना/लेखों के साथ उचित मूल्य का टिकट लगा लिफाफा अवश्य भेजें पंचाशक....आदि.
अन्यथा हम अस्वीकृति की दशा में रचना वापस नहीं भेज सकेंगे. उपर्युक्त मौलिक ग्रंथ उपलब्ध हैं. परन्तु उनके द्वारा रचित ग्रंथों में
श्रुतसागर, आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर से मात्र कुछ एक ग्रंथ ही वर्तमान काल में उपलब्ध होते हैं. 0
श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र, कोबा, गांधीनगर ३८२००९.
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/ जानो।
तो
श्रुत सागर, वैशाख २०५२ हिन्दू राष्ट्र नेपाल में प्रथम महावीरालय की
श्रुत सागर प्रतिष्ठा एवं उद्घाटन
प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता -२ काठमाण्डु] परम तारक श्री पञ्चम श्रुतकेवली श्री भद्रबाहुस्वामी की
जानें साधना भूमि हिमालय की गोद में बसे हिन्दू राष्ट्र नेपाल की राजधानी
प्रश्नावलीकाठमाण्डु नगर में सर्व प्रथम भगवान श्रीमहावीर का नयनरम्य भव्य १. इस चौवीसी में चक्रवर्ती कितने हुए? । जिनमंदिर निर्मित किया गया है. इस मंदिर का निर्माण संगमरमर पत्थर
२. श्रीमहावीर प्रभु का शासन कितने वर्षों तक चलेगा? से हुआ है. यहाँ भगवान महावीरस्वामी सहित अन्य जिन बिम्बों की प्रतिष्ठा
३. श्रीमहावीर प्रभु की प्रमुख साध्वी शिष्या का नाम क्या था? परम शासन प्रभावक राष्ट्रसंत आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी महाराज
४. श्रीपार्श्वनाथ भगवान के कितने गणधर थे? प्रमुख गणधरों के
नाम बताएं? की पावन निश्रा में २१.४.९६ से २५.४.९६ तक धूमधाम से सम्पन्न होगी.
५. श्रीपार्श्वनाथ भगवान के कितने भव थे? उनके भव की गिनती कहाँ इस अवसर पर कमल पोखरी, काठमाण्डु स्थित 'भगवान महावीर जैन
से होती है? निकेतन' में जिनभक्ति सहित अष्टानिका महोत्सव, धार्मिक अनुष्ठान,
६. अष्टमंगल कौन-कौन से हैं? प्रवचन, जागरण आदि कार्यक्रम आयोजित किए गये हैं. भारत भर से हजारों
७. कल्याणक कितने और कौन-कौन से हैं? की संख्या मे आए जैन श्रेष्ठियों की इस कार्यक्रम में भाग लेने की संभावना |
८. देवताओं के मुख्य लक्षण क्या हैं ?
९. कंदमूल का त्याग क्यों आवश्यक है? एक लंबे अरसे के बाद नेपाल पधारने वाले राष्ट्रसंत आचार्य श्री १०.स्वस्तिक का क्या प्रयोजन है? पद्मसागरसूरीश्वरजी महाराज पहले भगवंत हैं. आपश्री के स्वागत की
||| प्रश्नोत्तरी (क्विज़) प्रतियोगिता में भाग लेने की नियमावलीतैयारियाँ वहाँ हर्षोल्लास सहित जोर-शोर से चल रही है. . १. इस प्रतियोगिता में १४ से २५ वर्ष तक की आयु का युवावर्ग भाग ले सकता
राष्ट्रसंत आचार्यश्री का नेपाल में सम्पर्क सूत्रःभगवान महावीर जैन निकेतन
नेपाल जैन परिषद कमल पोखरी, काठमांडु, नेपाल
फोन- २२११६५, २२१५३६ (0) फोन- ४१४३०२, ४२१३७०,४१४२१५ (R)
फैक्स ९७७ -१-२२१४०३
आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर के विषय में
उद्गार
* अत्रत्यः संग्रहः महान् वैविध्यानुगतो दुर्लभप्रतिसंपन्नश्च.
___-प्रो. अशोक अकलूजकर, केनाडा. ★ हस्तप्रत सम्वन्धी संरक्षण-व्यवस्था ने अत्यधिक प्रभावित किया।
- राम कृपालु शर्मा, जयपुर. ★ यहाँ सत्यम्, शिवम् और सुन्दरम् का समन्वय एक जगह मिला । यदिहास्ति न चान्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्.
- प्रा. बिहारीलाल चतुर्वेदी, अहमदावाद. * It was an enchanting experience to visit this complex, which is a living symbol of Jaina generosity as also faith. The planning has been superb with lot of foresight and aesthetic sense. The collection has been such as to be a paradise for researchers.
- Prof. S. B. Deo, Pune. * We are really inpressed for collection and compilation and preservation of ancient manuscripts and we sincerely hope for its faster growth.
- M. C. Bhansali (Advocate), Kota.
२. प्रश्नों के उत्तर सुपाठ्य एवं पृष्ठ के एक ही ओर लिखे होने चाहिए. उत्तरपत्र
के साथ अपना नाम और पूरा पता स्पष्ट लिखें. ३. प्रश्नोत्तर १५-०६-१९९६ तक संपादक, श्रुतसागर, श्री महावीर जैन आराधना
केन्द्र, कोबा, गांधीनगर ३८२००९ को अवश्य प्राप्त हो जाने चाहिये, विलम्ब
से प्राप्त उत्तरों पर विचार नहीं किया जायगा. ४. सही उत्तरपत्रों में से विजेताओं के नाम लॉटरी द्वारा निकाले जायेंगे. प्रथम द्वितीय
एवं तृतीय पुरस्कार प्राप्त विजेताओं को क्रमशः १५०, १०० एवं ७५ रु. मूल्य की धार्मिक पुस्तकें प्रदान की जाएगी. तथा दो अनुमोदन पुरस्कार दिये जायेंगे. विजेताओं का नाम अगले अंक में प्रकाशित किया जाएगा तथा व्यक्तिगत सुचना
भी दी जाएगी. ५. इस प्रतियोगिता में श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र से सम्बन्धित कोई भी कार्यकर्ता
या उनके परिवार के सदस्य भाग नहीं ले सकते हैं. ६. सम्पादकों का निर्णय अन्तिम निर्णय माना जायगा.
श्रुत सागर प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता -१ के उत्तर १. राग-द्वेष आदि अन्तरशत्रुओं को जीतने के कारण तीर्थंकरों को जितेन्द्रिय अर्थात जिन कहा जाता है, २. आदीश्वर भगवान की माता मरुदेवी व पिता नाभि राजा थे. ३.वर्ष के अन्दर प्राणिमात्र के प्रति किये गए राग-द्वेष कषायादि सांवत्सरिक प्रतिक्रमण द्वारा क्षमापना करना व क्षमा देना. ४. प्रतिक्रमण करने से दिन व रात में किए गए पापों का नाश होता है, ५. रात में अति सूक्ष्म जीव आकाश मण्डल में व्याप्त रहते हैं. अतः भोजन करते| हुए इन जीवों की भोजन द्वारा हिंसा होती है. इसलिये जैन समाज में रात्रि भोजन का निषेध है| ६. श्री महावीर स्वामी के गणधरों में सर्वधिक आयुष्य १०० वर्ष आर्य सुधर्मास्वामी का था?|| ७. आचार्यश्री मानतुंगसूरीश्वरजी ने धारानरेश भोज के मंत्री मतिसागर के आग्रह पर इस स्तोत्र की रचना की. इसके प्रत्येक श्लोक के प्रभाव से लौह-शृंखला के ४४ बन्धन
खंडित हो गए. ८. ऋजुवालिका तीर्थ विहार के गिरीडीह जिले में सम्मेत शिखर तीर्थ से लगभग १०||
कि. मी. दूर है, भगवान महावीर को यहाँ शालि वृक्ष के नीचे केवल ज्ञान की | प्राप्ति हुई थी. ९. आचार्य श्रीमद् वुद्धिसागरसूरीश्वरजी १०५ ग्रंथों के प्रणेता थे. इनके प्रमुख ग्रंथ हैं- कर्मयोग, योगदीपक, भजनपदसंग्रह, जैन ऐतिहासिक रासमाला. समाधिशतकम्, १०. भगवती सूत्र आगम का पांचवा अंग है.. टिपणीः कोई भी सही उत्तर प्राप्त न होने के कारण किसी को भी पुरस्कार
नहीं दिये जा रहें हैं. -सम्पादक
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श्रुत सागर, वैशाख २०५२
जोधपुर स्थित सेवा मंदिर, रावटी के संस्थापक जौहरीमलजी पारख की चिर विदाई......
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सुप्रसिद्ध श्रुतसेवक श्री जौहरीमलजी पारख विगत ५ फरवरी १९९६ को दिवंगत हुए. स्व. जौहरीमलजी ने अपना समग्र जीवन श्री संघ के मूलभूत हितों एवं खास कर के जैन साहित्य के विकास एवं संरक्षण के लिए अर्पित कर दिया था. धार्मिक प्रवृत्तियों एवं अध्ययन में ही उन्होनें अपना प्रत्येक क्षण नियोजित किया था. वे स्वयं में एक संस्था थे.
पेशे से गोल्ड मेडलिस्ट चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट एवं सभी दृष्टि से सम्पन्न होते हुए भी उन्होंने वैरागी जीवन अपनाया था. पिछले ३० वर्षों से स्व. जौहरीमलजी का जीवन विशेष रूप से जैन साहित्य के संरक्षण व जैन वाङ्गमय के कार्यों में प्रवृत्त था. उन्होंने जोधपुर स्थित रावटी में सेवा मंदिर नामक संस्था स्थापित की. जैन साहित्य के संरक्षण एवं अध्ययन के लिए यह संस्थान अपना विशेष स्थान रखता है स्व० पारखजी अनेक जैन संस्थाओं एवं संगठनों से प्रगाढ़ स्म्प से जुड़े हुए थे तथा सभी सम्प्रदायों की ओर से उन्हें सम्मान प्राप्त था. समग्र जैन समुदाय से उन्होंने अपील की थी कि वे जैन धर्म की समृद्ध आध्यात्मिक परम्पराओं के संरक्षण के लिए आगे आएं.
स्व० जौहरीमलजी का जैन ज्ञान भंडारों के लिये अद्वितीय योगदान था उन्होंने जैसलमेर
व जोधपुर के ज्ञान भण्डारों में संगृहित हस्तलिखित ग्रंथों के बेटेलॉग तैयार करके जैन ज्ञान भण्डारों को अद्वितीय योगदान व मार्गदर्शन दिया है.
स्व० जौहरीमलजी पूना स्थित भण्डारकर ओरियंटल रीसर्च इन्टिब्यूट द्वारा डा. घाटगे के निर्देशन मे चल रहे प्रावृत शब्द कोष निर्माण परियोजना के प्रमुख प्रेरक थे. साङ्गोपाङ्ग प्राकृत व्याकरण की रचना करने का भी उनका स्वप्न था जो अधूरा रह गया है, जिसे पूरा करने का दायित्व विद्वद्वर्ग का है. श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र कोबा स्थित आचार्यश्री कैलाससागर सूरि ज्ञान मंदिर में हस्तप्रतों के सूचीकरण, संरक्षण, संवर्धन एवं एतदर्थ प्रक्रियाओं के निर्धारण हेतु उन्होंने अपना अमूल्य योगदान दिया था. उनकी सेवाओं की अनुमोदना के लिए आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञान मंदिर में प. पू. गणिवर्य श्री अरुणोदयसागरजी म. सा. की निश्रा में शोक सभा आयोजित की गई. इस सभा में संस्था की ओर से स्वर्गस्थ के
वश्यकी अनुमोदना की गई एवं आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञान मंदिर में संरक्षित पाण्डुलिपियों के सूचीकरण के कार्य में उनके योगदान का हृदयपूर्वक स्मरण किया गया. साथ ही साथ यह भावना भी व्यक्त की गई कि वृहद् जैन हस्तप्रत, प्रकाशन एवं कृतियों का सूचीपत्र बनाने का जौहरीमलजी का स्व'न जो कि इस संस्था में आगे बढ़ रहा है, पूरी निष्ठा के साथ संपूर्ण किया hair. आपश्री तथा प. पू. गणिवर्य श्री अरुणोदयसागरजी म. सा. ने स्व. जौहरीमलजी के अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिए कार्यकर्ताओं का आह्वान किया. सभा ने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए महामंत्र स्मरण पूर्वक प्रार्थना की.
स्व. जौहरीमलजी का जैन साहित्य के संरक्षण हेतु अद्वितीय योगदान था. वे एक आदर्श श्रावक धर्म के व्रती होने के साथ ही तपस्वी जीवन के बिल्कुल करीब थे जैन समाज उनके इस अकाल अवसान की क्षति पूर्ति नहीं कर सकेगा. मात्र जैन समाज ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारतीय विद्वसमाज उन्हें हमेशा याद करता रहेगा.
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नम्र निवेदन
आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर द्वारा चल रही श्रुतसंवर्धन की विविध प्रवृत्तियों में उदार मन से लाभ लीजिये और पुण्य उपार्जन कीजिये ।
सहकार ही सफलता का सूत्र है ।
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७
• आचार्यश्री कैलाससागरसूरि........
पृष्ठ ८ का शेष ] नगर प्रमुख हैं. आचार्यश्री महानगरों के साथ-साथ गाँवों में भी चातुर्मास करने आचार्यश्री के पावन उपदेशों एवं उनके उज्ज्वल जीवन से प्रभावित होकर कई महान् के विशेष इच्छुक थे. उन्होंने कई छोटे-छोटे गाँवों में भी चातुर्मास किये थे, पूज्य आत्माओं नें संयम ग्रहण किया. निम्नलिखित आचार्य साधु भगवंतों ने पूज्य आचार्यश्री के पास ही उनके शिष्य के रूप में दीक्षा ग्रहण की थी.
१. पूज्य पंन्यास श्री सूर्यसागरजी म. सा. २. पूज्य आचार्यश्री भद्रवाहुसागरसूरीश्वरजी म. सा. ३. पूज्य प्रवर्तक श्री इन्द्रसागरजी म. सा. ४. पूज्य आचार्यश्री कल्याणसागरसूरीश्वरजी म. सा. ५. पूज्य मुनि श्री कंचनसागरजी म. सा. ६. पूज्य गणिवर्य श्री ज्ञानसागरजी म. सा. ८. पूज्य मुनि श्री संयमसागरजी म. सा.
इनमें से पूज्य पंन्यास श्री सूर्यसागरजी म. सा. एवं पूज्य प्रवर्तक श्री इन्द्रसागरजी म. सा. का स्वर्गवास आचार्य श्री की विद्यमानता में ही हो गया था. श्री के ३० से भी अधिक प्रशिष्यादि हैं. जिसमें प. पू. राष्ट्रसंत आचार्य श्री पूज्य आचार्य पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. का नाम विशेष उल्लेखनीय है. इसके अतिरिक्त आचार्यश्री के आज्ञानुवर्ती साधु-साध्वियों का भी विशाल समुदाय है.
पूज्य
प्रतिलेखन करने के लिए आचार्यश्री ने कायोत्सर्ग किया. वस,वह कायोत्सर्ग पूर्ण वि. सं. २०४१, ज्येष्ठ सुदि २ के दिन प्रातः काल का प्रतिक्रमण पूर्णकर, हो, उससे पहले ही आचार्य श्री की जीवन-यात्रा ही पूर्ण हो गयी. ज चतुर्विंशति स्तव में 'समाहि वर मुत्तमं दित्तु' जैसे मंगल शब्दों द्वारा समाधिमय मृत्यु समाधिमय मृत्यु प्राप्त की. जिस मृत्यु के विचार मात्र से व्यक्ति भयभीत हो जाता की प्रार्थना की जाती है, उसी चतुर्विंशति स्तव के कायोत्सर्ग में पूज्य आचार्यश्री ने है, वह मृत्यु आचार्यश्री के चरणों में झुक गई. पूज्य आचार्यश्री का अंतिम संस्कार श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र, कोवा के प्रांगण में किया गया था.
कई सदियों के बाद ऐसे विरल और विराट व्यक्ति का समाज में अवतरण होता है, जो स्व- आत्मकल्याण के साथ-साथ हजारो-लाखो लोगों को आत्मकल्याण के पथ और मरना तो सांसारिक जीव का एक स्वभाव है. जन्म लेने वाला व्यक्ति एक न पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देकर उनके जीवन-पथ को आलोकित करते हैं. जन्म लेना एक दिन अवश्य ही मरता है. परन्तु समाधिमय मृत्यु विरलों को ही प्राप्त होती है. पूज्य आचार्यश्री की समाधिमय मृत्यु उनकी उज्वल एवं पवित्र जीवन-साधना का स्पष्ट चित्रण है.
आचार्यश्री अपनी मृत्यु को शोक नहीं, बल्कि महोत्सव बनाकर गए. आपकी समग्र जीवन साधना मृत्यु के लिये थी. आचार्य श्री हर समय कहा करते थे कि मैं
समाधिमय मृत्यु प्राप्त करना चाहता हूँ. वास्तव में यही हुआ, उन्होंने पूर्ण जागृति, शांति एवं प्रसन्नता के साथ मृत्यु प्राप्त की.
अपनी आत्मशुद्धि की और उनसे कहा कि- “मैं मृत्यु प्राप्त कर श्री सीमंधरस्वामी मृत्यु से पूर्व रात्रि में अपने शिष्यों-प्रशिष्यों आदि से मच्छामि दुक्कडं देकर परमात्मा के पास जाना चाहता हूँ, मुझे जीवन जीने की कोई इच्छा नहीं है और मरने का कोई डर नहीं है." यही आचार्यश्री के अंतिम उद्गार थे. आप शांति एवं प्रसन्नता की मूर्ति एवं समस्त जैन समाज के राहवर थे. आप में परमात्मा के प्रति श्रद्धा कूट-कूट कर भरी हुई थी. आपके रोम-रोम में जिन शासन और परमात्मा का नाम, प्राणी मात्र के प्रति मैत्री भावना की अपूर्व गूँज थी. आप अपना अधिकतर समय परमात्मा के स्मरण एवं चिन्तन मनन में व्यतीत करते थे. कभी आपको
व्यर्थ में समय व्यतीत करते नहीं देखा गया. जिस प्रकार से समय का सुन्दर उपयोग आचार्यश्री ने अपने जीवन में किया, शायद ही ऐसा इस काल में कोई कर सकेगा.
आचार्यश्री का जीवन एवं निर्मल चरित्र अपने आप में अनूठा, अनोखा, एवं एक आदर्श था, जो युगों-युगों तक श्रद्धालुओं के जीवन-पथ को आलोकित कर उन्हें उज्जवल जीवन जीने की प्रेरणा देता रहेगा. अंत में पूज्य आचार्यश्री के परम पावन चरण कमलों में भावभरी कोटिशः बन्दना .....
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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुत सागर, वैशाख 2052 कोबा स्थित महावीरालय में | ज्येष्ठ शु.२(स्वर्गारोहण दिवस के उपलक्ष्य में प. पू. भगवन्त को स्मरणाञ्जलि महान धर्म सम्राट, विविध विशेषताओं के धनी, सम्पूर्ण जैन समाज तिलक को सूर्य किरणें प्रकाशित करेंगी की महान विभूति, संयम आराधना की मंगलमूर्ति राष्ट्रसंत आचार्य श्री पद्मसागरसूरि महाराज साहेब की प्रेरणा से कोवा, आचार्यदेव श्री कैलाससागरसूरीश्वरजी गाँधीनगर में निर्मित श्री महावीर स्वामी के जिनालय में बुधवार, 22 मई को दुपहर म.सा. 2 बजकर सात मिनट पर प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी सूर्य किरणें मंदिर शिखर से प्रविष्ट होकर देरासर में विराजमान भगवान श्री महावीर स्वामी के तिलक को शासन के महान प्रभावक के रूप में आचार्यश्री सदियों तक भूलाए नहीं आलोकित करेंगी. इस अवसर पर देरासर में होने वाला भव्य प्रकाश अद्भुत रहेगा. जा सकेंगे. आचार्य श्रीकैलाससागरसूरीश्वरजी महाराज के वरदहस्त से हुई शासन इस अनुपम एवं अलौकिक दृश्य को ज्यादा से ज्यादा श्रद्धालु देख सकें, इस | प्रभावना का तो एक लम्वा इतिहास है.आपश्री द्वारा लगभग 63 अजनशलाकाएं, हेतु श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र परिसर में क्लोज सर्किट टी. वी. की व्यवस्था 80 जिनमंदिरों की प्रतिष्ठा, अनेक जिनमंदिरों का जीर्णोद्धार, 30 से भी अधिक उपधानतप की आराधनाएं आदि शासन-प्रभावना के अनेक विध कार्य सम्पन्न हुए की जाएगी. थे. आपश्री के हाथों में अञ्जन हुई मूर्तियों की संख्या लगभग 9000 से भी अधिक ज्ञात हो कि 22 मई 1987 को प. पू. गच्छाधिपति आचार्यश्री कैलाससागरसूरीश्वरजी | आचार्यश्री की सच्ची पहचान म. सा. का अन्तिम संस्कार कोवा में श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र परिसर में किया गया था. यह नहीं कि उन्होंने कई जिन मंदिरों पूज्य गुरु भगवंत की स्मृति को अमर करने के लिए प. पू. राष्ट्रसंत आचार्य | की स्थापना करवाई, उनकी सच्ची श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी महाराज की प्रेरणा से उनके विद्वान शिष्य-प्रशिष्यों ने जिस पहचान यह भी नहीं कि उन्होंने कई समय यह देरासर बन रहा था उस समय ऐसी ज्योतिषीय गणना द्वारा व्यवस्था की उपधान तप करवाए या उपाश्रयादि है कि प्रतिवर्ष 22 मई को दुपहर 2.07 वजे महावीर स्वामी के तिलक को मर्य वनवाए, ये सब कुछ तो उनके द्वारा किरणें प्रकाशित करें. हुए सहज कार्यों की पहचान है. उनकी यह दृष्य अनुपम एवं अद्वितीय होता है तथा इसका अवलोकन आलादक है. वास्तविक पहचान तो उनके विरल WITH BEST COMPLIMENTS FROM: व्यक्तित्व के पहचान में है. गागर का सच्चा परिचय गागर के किनारे से नहीं मिल सकता है, उसी प्रकार व्यक्ति की पहचान भी वाहर से नहीं, उसके अंतर-जीवन से होनी चाहिये. परंतु आचार्य श्री तो जैसे अंतर से थे वैसे ही बाहर से भी थे. उनका अंतर्मन जितना निर्मल और करुणामय था उतना ही उनका व्यवहार भी. वे अंदर और बाहर समान AGENCIES (INDIA) CORPORATION थे. हर व्यकति के प्रति उनका व्यवहार अंदर और वाहर से एक समान होता था. AICO AGENCIES PVT. LTD. अपने संयम जीवन के 47 वर्षों के दौरान पूज्य आचार्यश्री ने गुजरात, राजस्थान , मध्यप्रदेश, विहार, बंगाल, महाराष्ट्र आदि प्रान्तों में विचरण कर मानव 75, NEW CLOTH MARKET, के अंधकारमय जीवन को आलोकित करने का अथक पुरुषार्थ किया था. उन्होंने AHMEDABAD 380 002 अपने इस पुरुषार्थ में अपूर्व सफलता भी प्राप्त की थी . हजारों लोगों को व्यसनPhones : (Off)2144022, 2144122 (Res)7865325,7866575 मुक्त कर उन्हें शांतिपूर्ण एवं उज्ज्वल जीवन जीने का मार्गदर्शन दिया था. आचार्यश्री Fax:2145207 TELEX : 0121-691 अलग-अलग प्रांतों में विचरण करने के साथ-साथ वहां के महानगरों में चातुर्मास CABLE : ACRYSYNTH | भी किये थे, जिनमें वम्बई, पूना, कलकत्ता, अहमदावाद, जामनगर एवं पाली आदि [शेष पृष्ठ 7 पर श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र संचालित Book Post/Printed Matter आचार्य श्रीकैलाससागरसूरि ज्ञान मंदिर (पूर्णतया कम्प्यूटरीकृत शोध संस्थान) सह निदेशक (प्रशासन) : कार्य : ज्ञान मंदिर में संग्रहालय, ज्ञान-भंडार, कम्प्यूटर व शोध विभाग की प्रवृत्तियों का संयोजन / / योग्यता : उद्यमी, अनुभवी, परिपक्व, धार्मिक तथा उम्र 60 वर्ष से कम / भारती विद्या (विशेष रूप से जैन विद्या) एवं सम्वन्धित क्षेत्रों में रूचि तथा इस क्षेत्र में चल रही योजनाओं के संचालन व नई योजनाओं के क्रियान्वयन की क्षमता / अपेक्षित वेतन एवं वायोडाटा के साथ 15 मई 1996 तक निम्न पते पर आवेदन करें.|| Published & Despatched by Secretary, Sri Mahavir Jain Aradhana Kendra श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र Koba,Gandhinagar- 382009. Ph: 76204,76205, 76252 कोबा, गांधीनगर 382 009 |Printed at Dhvani Graphics,Vasana, Ahmedabad. Ph: 6634333 For Private and Personal Use Only