Book Title: Prakrut Prashna Garbha Panch Parmeshthi Stava
Author(s): Nalini Balbir
Publisher: ZZ_Anusandhan
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अज्ञातकर्तृक प्राकृत-प्रश्नगर्भ-पंचपरमेष्ठि-स्तव प्रो. नलिनी बलवीर नमस्कार महामन्त्र का प्रभाव तथा प्रचार जैन समाज में सर्वत्र है । जैन लोग इसे कण्ठस्थ करते हैं और सभी धार्मिक अवसरों पर "नवकार" को प्राकृत भाषा में ही सुनते हैं । यदि श्रद्धा के साथ इसका प्रयोग किया जाए तो सभी प्रकार के विघ्न नष्ट हो जाते हैं । यह भय से सुरक्षित रखता है । इसको प्रायः जैन गायत्री कहते हैं । इसे पढ़ने से जैसे द्वार अपने आप खुलते हैं । फरवरी १९९६ की बात है । एक प्रातःकाल आबु पर्वत के जैन मन्दिर में प्रवेश के समय मेरा खाकी वर्दी के संरक्षक से सामना हुआ । प्रातःकाल मन्दिर केवल जैनियों के लिए पूजार्थ खुला होता है । संरक्षक से हिन्दी में मेरा संक्षिप्त वार्तालाप आरम्भ हुआ । मैंने बताया कि मैं दूर से आयी हूँ, मैं जैन धर्म के विषय पर शोध कर रही हूँ। मैं ने पं. माल्वणिया और प्रो. भायाणी के नाम का उल्लेख किया । उसने उत्तर दिया-यदि तुम जैन हो तो नवकारमन्त्र सुनाओ । तभी मैंने उसे मन्त्र कह सुनाया और उसने बड़े आडम्बरपूर्ण ढंग से हाथ उठाकर मुझे मन्दिर में प्रवेश करने दिया । __ नमस्कार महामन्त्र के ऊपर असंख्य ग्रन्थ लिखे गए हैं । स्तोत्र, रास, १. पूर्व प्रकाशित निबन्ध का यह लेख संक्षिप्त रूपान्तर है। देखिए Nalini Balbir "Le Pañcanamaskāra en charades” Jaina-Itihāsa-Ratna. Festschrift für Gustav Roth zum 90. Geburtstag ed. by U. Hüsken, P. Kieffer-Pulz & A. Peters, Marburg, 2006 (Indica et Tibetica 47), pp. 9-31 स्व र्गीय डॉ. रोथ (१९१६२००८) ने पंचनमस्कारमन्त्र के विषय पर एक प्रेरणात्मक लेख लिखा है : “Notes on the Pamca-Namokkāra-Parama-Mamgala in Jaina Literature”, Adyar Library Bulletin. Mahāvira Jayanti Volume 38, pp. 1-18, reprinted in G. Roth, Indian Studies, Selected Papers, Delhi Shri Satguru Publica tions, 1986, pp. 129-147 २. देखिए James Laidlaw, Riches and Renunciation. Religion, Economy, and Society among the Jains. Oxford, Clarendon Press, 1995, p. 136 : “More than once when I was travelling ... in India I gained access to a closed Jain temple on the basis of little more than a clear recitation of the nokar mantra.'' Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७४ अनुसन्धान ५० (२) कथाए इत्यादि संस्कृत, प्राकृत, गुजराती, हिन्दी में उपलब्ध हैं । समस्त मन्त्र के पदों की संभाव्य संख्या, "हवई"/"होइ" पाठ की चर्चा और उसके पद्माकार में चित्रित रूप पर वाद-विवाद प्रचलित हैं । प्रश्नगर्भ-पंचपरमेष्ठि-स्तव एक ऐसा ग्रन्थ है जो प्रश्नोत्तर के रूप में नमस्कार मन्त्र का महत्त्व प्रस्तुत करता है। इस में माहाराष्ट्री जैन प्राकृत के ६ पद्य हैं। उनमें से पहले पांच (छन्दस्रग्धरा) अलग-अलग प्रश्नोत्तर प्रस्तुत करते हैं । अर्हत्-सिद्ध-आचार्यउपाध्याय तथा साधु के नमस्कार मन्त्र का हरेक भाग ढूढना इनका लक्ष्य है। _ नमो अरिहन्ताणं, नमो सिद्धाणं, नमो आयरियाणं, नमो उवज्झायाणं, नमो लोए सव्वसाहूणं । __ स्तव का अन्तिम पद्य (छन्द-शार्दूलविक्रीडित) फलश्रुति का द्योतक है। नमस्कार महामन्त्र की चूलिका पर (एसो पंचनमोक्कारो) स्तव में कुछ नहीं मिलता । यह स्तव विनोदी और उपदेशात्मक रीति में मौलिक प्रकार से पंचनमस्कार मन्त्र के शब्दों और पदों को रेखाङ्कित करता है और साथ ही कुछ सिद्धान्त परिकल्पनाओं का प्रदर्शन करते हुए उसके महत्त्व का और उसकी मन्त्रप्रकृति का उल्लेख करता है। प्रश्नोत्तर खेल विनोद के लिए भाषा के खेल ही नहीं है । किसी नाम का अन्वेषण उनका लक्ष्य हो सकता है । प्रेम के सन्दर्भ में वे नाम प्रेमपात्र के हैं । धार्मिक सन्दर्भ में (उदाहरणतः विज्ञप्तिपत्रों में) वे गुरु के नाम, उनके मातापिता के नाम या उनके जन्मस्थान के नाम हो सकते हैं। इस प्रकार पहेलियाँ आदरणीय व्यक्ति के प्रति भक्ति की अभिव्यक्ति करने की एक विधि हैं । पहेलियाँ आदरणीय व्यक्ति के प्रति भक्ति की ३. प्रेमविषयक और धर्मविषयक जैन प्रश्नोत्तरों के बारे में देखिए Nalini Balbir, “Theorie et pratique de la devinette en miliu jaina. I. Les Cent soixante et une devinettes de Jinavallabha. II. Devinettes en contexte", Bulletin d'Etudes Indiennes 20.2 (2002), pp. 83-243; “Grammatical riddles in Jain literature” in Jambū-jyoti (Muni Jambūvijaya Festschrift), ed. M. A. Dhaky & J. B. Shah, Ahmedabad, 2004, pp. 269-309; “Gurubhakti through word-puzzle in the Jain context" in Vani-jyotih 17-18 (Prajnana-Mahodadhih, Prof. Dr. Gopinath Mohapatra Felicitation Volume), Department of Sanskrit, Utkhal University, Bhubaneswar, 2003, pp. 181-203. Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मार्च २०१० अभिव्यक्ति करने की एक विधि हैं । पहेलियाँ के दो पक्ष हैं। रूप की दृष्टि से विनोदजनक पर विषय की दृष्टि से गम्भीर । इस स्तोत्र में कुछ प्रश्न और उत्तर जैन धर्म के सामान्य सिद्धान्तों व मूल्यों का उल्लेख करते हैं। उनमें पंचपरमेष्ठियों के नामों की निरुक्ति नहीं मिलती । कुछ और पंचनमस्कार के मन्त्र के मूल्य और ध्यान के फल को रेखाङ्कित करते हैं जैसे हेमचन्द्राचार्य के योगशास्त्र ८/८-९ में मिलता है। इस स्तोत्र के अहँ और ॐ के उत्तरों मे पंचनमस्कार का सार मिलता है । उपाध्याय और नील वर्ण का सम्बन्ध स्तोत्र के चौथे पद्य में आता है। इस सम्बन्ध की उत्पत्ति अज्ञात होते हुए भी महामन्त्र की साधना में पाच परमेष्ठियों और पाँच वर्गों के बीच में एक विशिष्ट सम्बन्ध विकसित हो गया है। मध्यकालीन पाण्डुलिपियों में इस प्रकार के चित्र मिलते हैं ५। आधुनिक जैनियों की दृष्टि में यह सम्बन्ध स्वाभाविक है । पूर्ण रूप में पांच भूत और शरीर के पांच अंगों में भी यह सम्बन्ध है। सफेद मस्तक का ऊपरी भाग सिद्ध लाल आग आचार्य पीला हृदय उपाध्याय नीला नाभि वायु साधु । काला आकाश अर्हत । पानी पृथ्वी पैर ४. इसके लिये देखिए महानिसीहसुत्त ३/९ । ५. देखिए U. P. Shah, “Panca-Paramesthis' in Jaina-Rupa-Mandana (Jaina Iconography). New Delhi : Abhinav Publications, 1987, p. 44; British Library हस्तप्रत नं. Or. 2116C, पत्र १; और देखिए पंडितराज श्रीधुरन्धरविजयजी गणिवर्य, मुनिवर्य जम्बूविजयजी, मुनिवर्य श्रीतत्त्वानन्दविजयजी, नमस्कार स्वाध्याय संस्कृत विभाग, बम्बई, जैन साहित्य विकास मण्डल, १९६२, पृ. १६ के सामने तथा Victorious Ones. Jain Images of Perfection, ed. Ph. Granoff, Rubin Museum of Art, New York, 2009, p. 287, "P-34 The meaning of the Mantra Om Hrim". ६. देखिए पू. मुनिराज श्रीकुन्दकुन्दविजयजी महाराज सा., नमस्कार चिन्तामणि, श्रीजिनदत्तसूरि मण्डल, दादावाड़ी, अजमेर, १९८०, पृ. १४४-१४५ (श्रीचिन्तामणि पार्श्वनाथ जैन Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७६ अनुसन्धान ५० (२) __इस स्तोत्र के तीसरे पद्य के अनुसार "नमो आयरियाणं" के जाप से "थम्भ" हो सकता है। पानी या आग को स्तम्भ करना एक कार्य है जो मन्त्रों के जाप से ही होता है । जैसे योगशास्त्र में लिखा है। पीतं स्तम्भे ऽरुणं वश्ये क्षोभणे विद्रुमप्रभम् । कृष्णं विद्वेषणें ध्यायेत् कर्मघाते शशिप्रभम् ॥योगशास्त्र ८/३१॥ इस स्तोत्र के अन्त में जो अष्टदल कमल आता है वह प्रश्नगर्भपंचपरमेष्ठि-स्तव के दोनों अर्थों को स्पष्ट करता है । अष्टदल कमल प्रश्नोत्तर का एक प्रकार है और साथ ही वह ध्यान का यन्त्र या मण्डल का साधारण रूप भी है। योगशास्त्र ८/३३-३४ के अनुसार पंचपरमेष्ठियों के नमस्कारमन्त्र को वही रूप देना चाहिए७ । हस्तप्रत ऐसा लगता है कि प्रश्नगर्भ-पंचपरमेष्ठि-स्तव के हस्तप्रत कम हैं और इसीलिए ग्रन्थ का प्रसारण भी सीमित रहा है । New Catalogus Catalogorum में इसकी केवल दो प्रतियों का उल्लेख है । मैं ने इन दोनों उपलब्ध हस्तप्रतों का प्रयोग किया है । पू° - यह हस्तप्रत Bhandarkar Oriental Research Institute पूणे का है । क्रमसंख्या ७४३ (अ)/१८९२-१८९५; पंचपाठ; पत्रसंख्या १; परिमाण २५ x १०'५; पंक्तिया १४, अक्षर ५५ । रचनासमय और लेखनसमय नहीं दिये हैं । लिपि स्पष्ट है । प्रश्नगर्भ-पंचपरमेष्ठि-स्तव पृष्ठ की सीधी तरफ पर है। इसके मध्य में अष्टदल कमल का रेखाचित्र है। परिसरों में वृत्ति लिखी श्वेताम्बर मन्दिर भूपतवाला, हरिद्वार, पृ. ११५); Acharya Sushil Kumar, Song of the Soul. An Introduction to the Namokar Mantra and the Science of Sound. New Jersey: Siddhachalam Publishers, 1987, p. 44 ७. यह भी देखिए : डॉ. नेमिचन्द्र शास्त्री, मंगलमन्त्र णमोकार एक अनुचिन्तन, दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, २००४ (१४ संस्करण) पृ. ६३ और पू. मुनिराज श्रीकुन्दकुन्दविजयजी महाराज सा., नमस्कार चिन्तामणि, श्रीजिनदत्तसूरि मण्डल, दादावाड़ी, अजमेर, १९८०, पृ. १४४ (श्रीचिन्तामणि पार्श्वनाथ जैन श्वेताम्बर मन्दिर भूपतवाला, हरिद्वार, १९९९, पृ. ११५)। Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मार्च २०१० ७७ हुई है । हस्तप्रत-वर्णन के लिए देखिए H. R. Kapadia, Descriptive Catalogue of the Government Collections deposited at the Bhandarkar Oriental Research Institute, Volume XIX, Part I, Poona, 1957 पृ. ३५४-३५६ । ल' - यह हस्तप्रत लन्दन में India Office Library (British Library) का है । क्रमसंख्या I. O. San. 25727(E); पंचपाठ; पत्रसंख्या १; परिमाण २५ x १०; पंक्तियाँ १४ । रचनासमय और लेखनसमय नहीं दिये हैं। लिपि स्पष्ट है । सीधी तरफ के मध्य में अष्टदल कमल का रेखाचित्र है जिसमें पांचवे श्लोक की पहेलियों के उत्तर लिखे हैं । परिसरों में वृत्ति लिखी है परन्तु वह थोड़ी-बहुत नष्ट हो गई है इसीलिए अपूर्ण है । हस्तप्रत-वर्णन के लिए aray Nalini Balbir, Kanubhai V. Sheth, Kalpana K. Sheth, C. B. Tripathi, Catalogue of the Jaina Manuscripts of the British Library, London : British Library & Institute of Jainology, 2006, नं. ९२० । प्रश्नगर्भ-पंचपरमेष्ठि-स्तव के बाद इन दोनों हस्तप्रतों में एक दूसरा ग्रन्थ है । इन दोनों में ही इस ग्रन्थ का नाम वर्धमान-स्तोत्रम् समस्यामयम् दिया गया है। प्राकृत में लिखे इस ग्रन्थ में १२ श्लोक हैं और उसकी व्याख्या संस्कृत में है। प्रश्नोत्तर के स्थान पर यह स्तोत्र समस्यापूरण के रूप में आता है । दोनों हस्तप्रतों में इस दूसरे ग्रन्थकार एक जयचन्द्रसूरि है । जयचन्द्रसूरिकृतम् (पू०) भट्टारक-प्रभु-श्रीजयचन्द्रसूरिपाद-प्रणीतम् इदं (ल०) इसके विपरीत प्रश्नगर्भ-पंचपरमेष्ठि-स्तव की प्रशस्तियाँ कम स्पष्ट हैं। जयचन्द्रसूरि का नाम केवल पू० हस्तप्रत की वृत्ति के अन्त में आता है। यह सम्भव है कि जयचन्द्रसूरि इन दोनों स्तोत्रों के ग्रन्थकार हैं । पर यह जयचन्द्रसूरि कौन से हैं और उनका समय क्या है इस विषय पर कोई सूचना नहीं मिली है। ८. देखिए साराभाई नवाब, जैनस्तोत्रसंदोहस्य द्वितीयभागः । Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७८ अनुसन्धान ५० (२) संस्कृत-वृत्ति-सहित प्राकृत मूल रेहाहि को तहिं ? को विणयरस-जुओ ? सम्मओ बेइ चक्कं । किंरूवं ? "मंतबीअं किमिह सिवकए ? 'निक्किवो को ? सुहं किं ?। "पूयत्थं वा पयं किं ? भणह पडकए केरिसं किं निमित्तं ?।। 'किं सिद्धन्तस्स आई ? १°सयलसुहकरं किं पयं ? झायए तं ॥१॥ __ - णमो अरिहंताणं । - शृङ्खलाजाति त्रिर्गतश्च । वृत्ति - 'रेखाभिस्तिसृभिर् ण्ण इति प्राकृतत्वाद् विभक्तिलोपः । 'नमतीति नमोऽच् [= हेमचन्द्र व्याकरण ४/१४९] इत्यनेनाऽच् विनातो नमो नंता भवति । सम्मदो हर्षो ब्रूते तस्य सम्बोधनं हे मोद ! अरा अस्य सन्तीति अरि चक्रं । मन्त्रबीजं अहँ । अकारं विनापि हैं इत्यपि भवति । 'निष्कृतो हन्ता । सुखं त्राणं पूजार्थं नमः पदं । “पटस्य कारणं अहँ योग्यं वदन्ति । आगमस्याऽऽदिर् णमो अरिहंताणं इति ॥१॥ 'किंरूवं अड्डविन्दं हवइ ? 'दुहयरी का हरो आह सत्ता ? । सेवित्ता कं व सिद्धा ? "किमु भणिअ जिणो संपवज्जेइ दिक्खं ॥ ५अत्थीणं बेइ खुद्दो किमु ? भणइ ससी केरिसं कामिचित्तं ?।। ७अंतद्धाणं अणंतं किम् ? "इह विजयए मंगलं किं वा(व) बीअं?॥२॥ - नमो सिद्धाणं ॥ - पंचकृत्वो गतिः । "भणिय पू० । अत ल० । “च वा के स्थान पर पू० ।। वृत्ति - आढ्यवृन्दं न मुष्णातीत्येवं शीलं न मोषि ध्राणं च तृप्त भवति । 'दुक्खकरी न मा अलक्ष्मी । नसमानार्थो नशब्दोऽस्ति तेन समासः । उ: शिवस्तस्य सम्बोधनं हे उ ! प्राक्संधौ नमो इति । सिद्धानामाज्ञां पालयित्वा सिद्धा भवन्ति । नमो सिद्धाणं इति भणित्वा जिनो दीक्षां प्रतिपद्यते । पक्षुद्रः कृपणो नेति भणति । 'माश्चन्द्रः प्राकृते सम्बोधने मो इति सह इना कामेन वर्त्तते यत् तत् सि क्लीबत्वाद्धस्वः । ७अंतद्धानमिति पदम् अन्तं विना द्धाणमिति । 'द्वितीयं मंगलं नमो सिद्धाणमिति विजयते ॥२॥ १ घ्राणं च तृप्तं भवति ल० [हेमचन्द्र अभिधानचिन्तामणि ३/९० तृप्तिः सौहित्यम् आघ्राणम्; पाठान्तर आध्राणः] । २. अलक्ष्मीः पू० । ५ निति ल० । Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मार्च २०१० 'पावाणं के ? 'जिणाणं किमु करिअ सुही कं मुणी ? 'माणमोहा । किंरूवाणाइ ‘णंता ? "विउलधणभरो वड्डए केरिसाणं ? ॥ पविज्जा विन्नाणभागी हवइ सुनिउणो केरिसो केसि ? किं वा थम्भेई नीरमाई पयमणहमणं ? झायए तं मणेणं ॥३॥ ___ - नमो आयरिआणं ॥ -चतुःकृत्वो गतिः । वृत्ति - पावा ॥ 'पापाः पापवन्तस् तेषां न मोदा अहर्षा भवन्तीति योगः । 'जिनानामाज्ञामाचर्य पालयित्वा मुनिः सुखी भवति । 'समानदीर्घत्वेऽकारस्य पुनर्ग्रहणं मानमोहावनाद्यनन्तौ आद्यन्ताक्षरवजितौ किंरूपौ णमो इति । "विपुलधनभरो वर्द्धते । आयकृतानां लाभप्राप्तानां । रिं पित् गतौ [ हेमचन्द्र धातुपाठ ५/१४-१५] रि इति धातौ आयरितानां वा स एवार्थः । “विद्यादिभागी भवति । नमो नन्ता आचार्याणामिति । स्तभ्नाति नीराद्युपसर्गान् “जलजलणाई सोलस पयत्थं थम्भन्तु आयरिया" इति वचनात् ॥३॥ ग्रहण ल० । अनाद्यानंतौ पू० । 'रिं पिग् गतौ पू० । पयत्तं पू० किंतु पय ल० । किं वक्कालंकिइम्मी ? किमु विहुरवयं ? २कं करित्ताण विन्नू ?। ४आयाणं किं अउव्वं विवरीअम् ? "इह को किं व पाढ(ढे)इ पुट्वि? ॥ कोऽभावं बेइ ? को वा हवइ अहभरा केरिसाणं जणाणं ?। 'झाइज्जन्तं पयं कि हणइ दुहभरं नीलवण्णं तिसंझं ?॥४॥ __ - णमो उवज्झायाणं । -गतागतं द्विगतिश्च । 'वाक्का ल० । विन्नू पू० परन्तु वन्नु ल० । 'पोढेइ पू० । द्विर्गतिश्च पू० । वृत्ति – 'किं व० णम् इति वाक्यालंकृतौ [देखिए हेमचन्द्र व्याकरण ४/ २८३] । विधुरजनस्य भयभीतजनस्य वच उ इति । उपाध्यायाज्ञां कृत्वा विज्ञो भवति । आयाणं अपूर्वं न विद्यते पूर्वः प्रथमो वर्णो यत्र तदपूर्वं याणम् इति विपरीतं च तत् "णंया" इति भवति । 'अज्झावउ अध्यापकः उम् इति पूर्वमादौ छात्रान् पाठयति । अभाववाची न इति । (वृत्ति का पाठ अब से केवल पू० के आधार पर दिया गया है । ल० के बाएँ परिसर पर यह आगे चलता है पर पृष्ठ बिगडा हुआ है।) “मोचनं मोको भावाकोंर् घञ् [= हेमचन्द्र व्याकरण ५/३/१८] इति घञ् न मोको मुक्तिरित्यर्थः, वज्झायाणं हत्यानां हत्याकारीणां Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसन्धान ५० (२) जनानां “पापसमूहाजनारगयभा (?) उवज्झायाणम् इति पदं ॥४॥ "यणां पू० । 'किं सुक्खं ? किं गुणड्ढे ? २किमिह रसयरं ? "कं हणंतीह वाहा ?। ५धन्नं किं बिंति लोआ किमवि ? 'पभणए वंजणं सीअलं किं ? ॥ "निंदत्थं बेइ जीवं कमह जणगणो ? “कं व देसं जिणंदा ॥ भासन्ते ? किं पयं जं अणवरयमहाझाणजुग्गं मुणीणं ॥५॥ - नमो लोए सव्वसाहूणं । -अष्टदलकमलं । 'मुक्खं पू०, सुखं ल० । ‘व द० जिणंदा के स्थान पर ब द० जिणिंदा पू० । महोझाण पू० । जुगं ल०। वृत्ति-किं सु० ॥ न ऋणं ऋकारस्याऽकारे तल्लोपे च सति न ऽणम् इति ऋणाभावः सौख्यं । मुनीनां नावौ (?) मौनं मुनित्वं श्रामण्यं गुणाढ्यं मौनं सर्वार्थसाधनम् । इति वचनान् ... ३... नानावो वा लोणं लवणं रसतरं । "हरिणं घ्नन्ति व्याधास् । “सणं धान्यविशेषः [ देखिए हेमचन्द्र अभिधानचिन्तामणि ४/२४५] । ६व्यंजनं... शीतं ...वणं जलकाननं (?) वा । साणं श्वा इति निन्दार्थं जनो ब्रूते एष श्वा इति । “कं वा देश ... जनगणो ब्रूते हूणां किं पदमुपदिशन्ति (?) यदनवरतं निरन्तरं ध्यानं योग्यं मुनीनां नमो लोए सव्वसाहूणमिति पदं ॥५॥ एवं जे परमेट्ठिपंचगपयप्पन्हेसु ताई जणा। जाणित्ता पइवासरं निअमणे धारंति झायंति य । तेसिं दुट्टतमट्ठकम्मविगमा तेलुक्ककप्पडुमो । एसो सो परमिट्ठिमंतपवरो दिज्जा सुहं सासयं ॥६॥ इति प्रश्नगर्भं पंचपरमेष्ठिस्तवः (ऐसे ही पू०, ल०) वृत्ति – एवं जे० सुगमं । नवरं परमेष्ठिपंचकपदप्रश्नेषु तानि परमेष्ठिपदानि पंच ज्ञात्वा निजमनसि धारन्ति ध्यन्ति च । तेषामेव श्रीपंचपरमेष्ठिमन्त्र[त्रैलोक्यकल्पद्रुमः शाश्वतं सुखं करोत्विति ॥ इति प्रश्नगर्भं श्रीपंचपरमेष्ठिस्तवनं भट्टारकप्रभुश्रीजयचन्द्रसूरिविरचितमिति । (ऐसे ही पू०) Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मार्च २०१० हिन्दी अनुवाद (१) तीन रेखाओं से युक्त क्या है ? - णकार (ण) अरिहं (अरिहं) विनय रसवाला कौन है ? हर्ष पूछता है कि एक चक्र कैसा है ? -ए हर्ष ! अरावाला (मोअ अरि) सुख के लिए इस संसार में मन्त्र का बीज क्या है ? "करुणाहीन कौन है ? सुख क्या है ? सुरक्षा (ताणं) घातक ( हन्ता) " सम्मान के अर्थ में कौन सा शब्द है ? नमस्कार (णमो) ‘कहो कपड़े का कारण क्या और कैसे है ? - यथोचित सूत (अरिहं ताणं) ९सिद्धान्त का आरम्भ क्या है ? - अरहन्तों का नमस्कार ( णमो अरिहंताणं) १० कौन सा ऐसा शब्द है जो सारे सुख प्रदान करता है ? उस पर ध्यान करो । अरहंतों का नमस्कार ( णमो अरिहंताणं) (२) 'समृद्ध व्यक्तियों का समूह कैसा है ? - चोरी करनेवाला नहीं अर्थात् संतृप्त (न मोसिद्धाणं) `शिव कहते हैं कौनसी स्त्रीवाची जीव दुःख करनेवाली है ?- ए शिव ! लक्ष्मी का अभाव (नमो न मा उ) किसकी सेवा करके लोग सिद्ध होते हैं ? - जो नमस्कार करता है (णमो) " क्या कहकर जिन ने दीक्षा का प्रतिपादन किया ? सिद्धों की आज्ञा की - - - “कृपण व्यक्ति प्रार्थनार्थियों से क्या कहता है ? चन्द्रमा कहता है अनुरागियों का हृदय कैसा होता है ? - ८१ नहीं (ण) सिद्धों को नमस्कार (नमो सिद्धाणं) "बिना “अन्त” के “अन्तद्धाणं" कैसे ? द्धाणं (द्धाणं) (सिद्धाणं) हे चन्द्रमा ! अनुरागपूर्ण (मो सि) ' इस लोक में किस दूसरे मङ्गलमन्त्र की विजय होती है ? सिद्धों को नमस्कार (नमो सिद्धाणं) Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसन्धान ५० (२) (३) 'दुर्जनों के भाव कैसे होते हैं ? - उनको आनन्द नहीं मिलता (न मोआ) जिनों का क्या करके मुनि सुखी होता है ? - उनके आदेश का पालन ___करके (आयरियाण) ३आदि और अन्त के बिना "माण" और "मोह" कैसे होते हैं ? - णमो (णमो) "विपुल धन का भार किन व्यक्तियों पर बढ़ता है ? - जिनकी आय में वृद्धि होती है (आयरियाण) पकिस प्रकार का व्यक्ति विद्या और विज्ञान का भागी है और किन व्यक्तियों के लिए ? - जो आचार्यों को नमस्कार करता है (नमो आयरियाणं) ऐसा कौन सा अनवद्य महामन्त्र है जो पानी और अन्य विघ्नों को रोक देता है ? अपने मनमें उस पर ध्यान करना चाहिए । - आचार्यों को नमस्कार (नमो आयरियाणं) (४) 'वाक्य के अलंकार के उपयोग में क्या है ? - णं निपात (णम्) संत्रस्त व्यक्ति किस शब्द का प्रयोग करता है ? - ओ (ओ) किसकी सेवा करके व्यक्ति विवेकी होता है ? - उपाध्यायों की आज्ञा की (उवज्झायाणं) ४आरम्भ के बिना और विलोम के "आयाणं" का क्या होता है ? - णंया (णंया) 'इस संसार में सबसे पहले कौन क्या पढ़ाता है ? - अध्यापक, ओं (उज्झावउ ओं) ६अभाव का द्योतक क्या है ? - नकार (ण) "किस प्रकार के लोगों के लिए पाप के भार का क्या परिणाम होता है ? - हत्याकारियों के लिए मुक्ति नहीं (ण मोउ वज्झायाणं) "नीले रंग के किस शब्द पर दिन में तीन बार ध्यान करने से दुःख का भार नष्ट हो जाता है ? - उपाध्यायों को नमस्कार (णमो उवज्झायाणं) (५) 'सुख क्या है ? - ऋण का अभाव (न 'णं) गुणों से समृद्ध क्या है ? - मौन (मोणं) Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मार्च 2010 83 परक संव Name इस संसार में अधिक से अधिक क्या स्वादिष्ट कनिणा- पोकिसक है ? - नमक (लोणं) "इस लोक में व्याध किस को मारते हैं ? - मृग को (एणं)। "एक प्रकार के धान्य को लोग क्या कहते हैं ? - गांजा (सणं) शीत... को क्या कहते हैं ? - घाव / अरण्य (व्वणं) "निन्दा करने के लिए लोग किस जीव का निर्देश करते हैं ? - कुत्ते का (साणं) ‘और निन्दा करने के लिए जैन लोग किस देश का निर्देश करते हैं ? - हूणो के देश का (हूणं) 'निर्बाध और गहन ध्यान के योग्य मुनियों के लिए कौन सा मन्त्र है ? -इस विश्व के सभी साधुओं को नमस्कार (नमो लोए सव्वसाहूणं) (6) पंचपरमेष्ठियों के प्रश्नसम्बन्धी इन श्लोकों से अवगत होने पर जो लोग इन को अपने मन में धारण करते हैं और प्रतिदिन ध्यान करते हैं उनको यह पंचपरमेष्ठि उत्कृष्ट मन्त्र जो तीनों लोकों का कल्पवृक्ष है उनके आठ कर्मों के अन्धकार के लुप्त होने पर शाश्वत सुख देगा / C/o. सोर्बोन नूवेल विश्वविद्यालय पेरिस, फ्राँस [email protected]