Book Title: Updeshsapttika Navya
Author(s): Kshemrajmuni, Jinendrasuri
Publisher: Harshpushpamrut Jain Granthmala

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Page 464
________________ उपदेश ।।४४२ ॥ घरि पुरि भिक्खा ||४४ || पंचमहवयमेरु धरेवा भुयबलि निय सिरिलोयकरेवा । दुसह परीसह अंगि सहेवा दुक्ख सुक्ख तलगार कहेवा ||४२ ॥ | सत्तुमित्त लणतुल्ल गणेदा विषयगुणिहि सुत्तत्थ भणेवा । दुक्कर किरिय करिसु तजं केम वच्छ सुक्ख अणुहवि सुर जेम ||४६ | भुक्तभोग चारित घरे जे रहि घरि नंदण रज्ज करे जे कहड़ कुमार किंपि न दुहे लउ धीर नरह सव्वं पिसुहेलउ ||४७|| दुद्धर गिरि भुपबलि उप्पाss मेरुसिहरि अपण परं वाइ | गयणमग्गि चरणहबलि चल्लइ सेसनाग नियकंठिहि घल्लइ ||४८ || तिहुयण जण नयणह विण कहइ जं असज्झ तं कज्ज पसाहव । इय अइमुत्त वयइ पिउ अग्गई दुक्करदिक सिक्ख सो मग्गइ ||४९ ।। उत्तालत्तणबाल न किज्जइ वित्तिय काल विलंब वहिज्जइ । इय जा जणणि जणय तं वृल्लई पुत्तविरह जाणी मनि उल्लई || ५० ॥ ताव कुमार कहइ भो निसुणह जीविय जुवण चवल विमाह । बालप्पणि जिणि धम्म न किओ लेगि अमिय मिल्हवि बिस पिउ || ५१|| बाल वृड्ढ तरुणो विन बुट्टइ लिइ जमककरिहि अखुट्टइ । श्रण परियण सह छड्डय पच्छद संबल विणु जणु परभवि गच्छ ॥ ५२ ॥ इनिणिय सुयपभणिय माया हरिमुल्लसिरसरीरा जाया । वलि जिउं तुह एरिस बुल्लइ छहि वरसिहं पंडि ||५३ || कवि माइपियरि अणुमन्त्रिय संघसयल अचिय बहुमन्निय । रयणुञ्जल आभरण अलंकिय चरण कजि लिय निस्सकिय ॥५४॥ नरसहस्वाणसिवियागय धरिय छतचामरज्य संगय जय जय रव माजण बुल्लई विरचित सुयनेहिणि सलई ॥ ५५ ॥ जह तारायणि ससि परियरियड परियणि सर्याणि तहा अणुसरीउ । पूरनादिगिरि अंबर गज्जई महुरभेरि झल्लरि तिहिं वजई || ५६ || रयहरणिहि मुणिवेसिहि जुत्तउ अइ असार संसार विरत । तिहि सप्ततिका. ।।४४२॥

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