Book Title: Udanam
Author(s): Jagdish Kashyap
Publisher: Uttam Bhikkhu
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१।१० ] बाहिय-सुत्तं
[७ दारुचीरियस्स चेतसा चेतो परिवितक्कमज्ञाय येन बाहियो दारुचीरियो तेनुपसङ्कमि, उपसकमित्वा बाहियं दारुचीरियं एतदवोच--'नेव खो त्वं बाहिय अरहा नापि अरहत्तमग्गं वा समापन्नो, सा पि ते पटिपदा नत्थि, याय त्वं अरहा वा अस्स अरहत्तमग्गं वा समापन्नो ।'
__ अथ खो केचरहि सदेवके लोके अरहन्तो वा अरहन्तमग्गं वा समापन्ना3"ति?
"अत्थि बाहिय ! उत्तरेसु जनपदेसु सावत्थी नाम नगरं। तत्थ सो भगवा एतरहि विहरति अरहं सम्मासम्बुद्धो। सो हि बाहिय ! भगवा अरहा चेव अरहत्ताय च धम्मं देसेतीति'।
__ अथ खो बाहियो दारुचीरियो ताय देवताय संवेजितो तावदेव सुप्पारकस्मा। पक्कामि। सब्बत्थ एकरत्तिपरिवासेन येन भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्सारामे तेनुप-सङकमि। तेन खो पन समयेन सम्बहुला भिक्खू अब्भोकासे चकमन्ति । अथ खो बाहियो दारुचीरियो येन ते भिक्खू तेनुपसडकमि, उपसङकमित्वा ते भिक्खू एतदवोच--"कहं नु खो भन्ते ! एतरहि भगवा विहरति अरहं सम्मासम्बुद्धो, दस्सनकामम्हा मयं तं भगवन्तं अरहन्तं सम्मासम्बुद्धन्ति।
"अन्तरघरं पविट्ठो खो बाहिय ! भगवा पिण्डाया'ति।
अथ खो बाहियो दारुचीरियो तरमानरूपो जेतवना निक्खमित्वा सावत्थि पविसित्वा अद्दस भगवन्तं सावत्थियं पिण्डाय चरन्तं पासादिकं दस्सनीयं सन्तिन्द्रियं सन्तमनसं उत्तमदमथसमथमनुप्पत्तं दन्तं गुत्तं सन्तिन्द्रियं नागं, दिस्वा येन भगवा तेनुपसङकमि, उपसङकमित्वा भगवतो. पादे सिरसा निपतित्वा भगवन्तं एतदवोच--"देसेतु मे भन्ते ! भगवा धम्म, देसेतु सुगतो धम्म, यं मम अस्स दीघरत्तं हिताय सुखायाति ।"
एवं वुत्ते भगवा बाहियं दारुचीरियं एतदवोच-"अकालो खो ताव बाहिय! पविट्ठम्हा पिण्डायाति।" दुतियम्पि खो बाहियो दारुचीरियो भगवन्तमेतदवोच"दुज्जानं खो पन तं भन्ते, भगवतो वा जीवितन्तरायानं मह्यं वा जीवितन्तरायानं, देसेतु मे भन्ते !... सुखायाति।" दुतियम्पि खो भगवा बाहियं दारुचीरियं एतदवोच-"अकालो... पिण्डायाति। ततियं पि खो बाहियो दारुचीरियो भगवन्तं एतदवोच--"दुज्जानं . . . देसेतु . . . सुखायाति ।
1A सम्मा-इति सर्वत्र. AB को; नास्ति पुस्तके C. 3AB ओ. 4A सुपा०, B सुपारकम्हा. B अ०.
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