Book Title: Udanam
Author(s): Jagdish Kashyap
Publisher: Uttam Bhikkhu

View full book text
Previous | Next

Page 28
________________ ३-नन्दवग्गो __ . (२१-कम्म-सुत्तं ३।१ ) एवं मे सुतं-एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। तेन खो पन समयेन अज्ञतरो भिक्खु भगवतो अविदूरे निसिन्नो होति पल्लकं आभुजित्वा उजु कायं पणिधाय पुराणकम्मविपाकजं दुक्खं तिप्पं खरं कटुकं वेदनं अधिवासेन्तो सतो सम्पजानो अबिहञमानो। अहसा खो भगवा तं भिक्खू अविदूरे निसिन्नं पल्लङकं आभुजित्वा ... पे... वेदनं अधिवासेन्तं सतं सम्पजानं अविहझमानं। अर्थ खो भगवा एतमत्थं विदित्वा तायं वेलायं इमं उदानं उदानेसि सब्बकम्मजहस्स2 भिक्खुनो धुनमानस्स पुरेकतं रजं । अममस्स ठितस्स तादिनो अत्थो नत्थि जनं लपेतवे' ति ॥१॥ ( २२–नन्द-सुत्त ३।२ ) एवं मे सुतं--एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। तेन खो पन समयेन आयस्मा नन्दो भगवतो भाता मातुच्छापुत्तो सम्बहुलानं भिक्खूनं एवमारोचेति--"अनभिरतो अहं आवुसो! ब्रह्मचरियं चरामि, न सक्कोमि ब्रह्मचरियं सन्धारेतुं,4 सिक्खं पच्चक्खाय हीनाय' आवत्तिस्सामी," ति। २१. 1 द्रष्टव्यं E. Müller, P.L.p, 38. 2A कम्महस्स. 3AB °थि. २२. 4C व्याख्यायते सन्धारेतुन् ति पवत्तेत. 5C होनाया ति गिहिभावाय आवत्तिस्सामति निवत्तिस्सामि. ३२ ] [ २१ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

Loading...

Page Navigation
1 ... 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104