Book Title: Thodi Laghu Krutiya Author(s): Vinaysagar Publisher: ZZ_Anusandhan View full book textPage 4
________________ अनुसन्धान ४२ (२) कनकमाणिक्यगणि कृत महोपाध्याय अनन्तहंसगणि स्वाध्याय अनन्त अतिशयधारी तीर्थङ्करों, गणधरों, विशिष्ट आचार्यों एवं महापुरुषों के नाम-स्मरण एवं गुणगान से हमारी वाणी पवित्र होती है। श्रद्धासिक्त हृदय से हमारी वाणी भी कर्मनिर्जरा का कारण बनती है । पूर्व में प्राय: करके ये समस्त गुणगान प्राकृत एवं संस्कृत भाषा में हुआ करते थे, किन्तु समय को देखते हुए आचार्यों ने इन कृतियों को प्रादेशिक भाषाओं में भी लिखना प्रारम्भ किया । मरु-गुर्जर भाषा में रचित काव्यों को गहूली, भास, स्वाध्याय, गीत आदि के नाम से कहा जाने लगा। प्रस्तुत कृति महोपाध्याय श्री अनन्तहंसगणि से सम्बन्ध रखती है । इस कृति का स्फुट पत्र प्राप्त हुआ है, जिसका विवरण इस प्रकार है :साईज २६४३, ११४३ से.मी. है। पत्र संख्या १, पंक्ति संख्या कुल १७ है। अक्षर लगभग प्रति पंक्ति ४५ हैं । लेखन संवत् नहीं दिया गया है, किन्तु १६वीं सदी का अन्तिम चरण प्रतीत होता है । स्तम्भतीर्थ में लिखी गई है। भाषा मरु-गुर्जर है । कई-कई शब्दों पर अपभ्रंश का प्रभाव भी नजर आता इसके कर्ता श्री कनकमाणिक्यगणि हैं । इनके सम्बन्ध में किसी प्रकारका कोई इतिवृत्त प्राप्त नहीं है। महोपाध्याय श्री अनन्तहंसगणि प्रौढ़ विद्वान् थे, और श्री जिनमाणिक्यसूरि के शिष्य थे । इस रचना के अनुसार तपगच्छपति श्री लक्ष्मीसागरसूरि ने इनको उपाध्याय पद प्रदान किया था और श्री सुमतिसाधुसूरि के विजयराज्य में विद्यमान थे। इस कृति के प्रारम्भ में उपाध्याय श्री अनन्तहंस गणि के गुण-गणों का वर्णन किया गया है । लिखा गया है कि ये जिनशासन रूपी गगन के चन्द्रमा हैं,त्रिभुवन को आनन्द प्रदान करने वाले हैं, नेत्रों को आनन्ददायक कन्द के समान हैं । मान रूपी मद का निकन्दन करनेवाले हैं । उपाध्यायों में श्रेष्ठ राजहंस हैं । सुधर्मस्वामी के Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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