Book Title: Sramana 1997 10
Author(s): Ashok Kumar Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 6
________________ जैन आगमों की मूल भाषा : अर्धमागधी या शौरसेनी? : 3 डॉ० नथमल टॉटिया ने दिल्ली की एक पत्रिका में छपे और उनके नाम से प्रचारित इस कथन का खण्डन किया है कि महावीरवाणी शौरसेनी प्राकृत में निबद्ध हुई। उन्होंने स्पष्ट मत प्रकट किया कि आचारांग, उत्तरध्ययन, सूत्रकृतांग और दशवैकालिक में अर्धमागधी भाषा का उत्कृष्ट रूप है"। दूसरी ओर प्राकृत-विद्या के सम्पादक डॉ० सुदीपजी का कथन है कि उनके व्याख्यान की टेप हमारे पास उपलब्ध है और हमने उन्हें अविकल रूप से यथावत दिया है। मात्र इतना ही नहीं डॉ० सुदीपजी का तो यह भी कथन है कि तुलसीप्रज्ञा के खण्डन के बाद भी वे टॉटिया जी से मिले हैं और टॉटिया जी ने उन्हें कहा है कि वे अपने कथन पर आज भी दृढ़ हैं। टॉटिया जी के इस कथन को उन्होंने प्राकत-विद्या जुलाई-सितम्बर ६६ के अंक में निम्न शब्दों में प्रस्तुत कियाः “मैं संस्कृत विद्यापीठ की व्याख्यानमाला में प्रस्तुत तथ्यों पर पूर्णतया दृढ़ हूँ तथा यह मेरी तथ्याधारित स्पष्ट आवधारणा है जिससे विचलित होने का प्रश्न ही नहीं उठता है"। (पृ०.६) . यह समस्त विवाद दो पत्रिकाओं के माध्यम से दोनों सम्पादकों के मध्य है, किन्तु इस विवाद में सत्यता क्या है और डॉ० टॉटिया का मूल मन्तव्य क्या है, इसका निर्णय तो तभी सम्भव है जब डॉ० टॉटिया स्वयं इस सम्बन्ध में लिखित वक्तव्य दें, किन्तु वे इस संबंध में मौन हैं। मैंने स्वयं उन्हें पत्र लिखा था, किन्तु उनका कोई प्रत्युत्तर नहीं आया। जहां तक प्रो० टाटिया के वक्तव्य का प्रश्न है वे जैन धर्म दर्शन के एक गहन अध्येता तथा स्पष्टवादी वक्ता हैं। तथ्य से परे उनका कभी कोई वक्तव्य मेरी जानकारी में नहीं आया। डॉ० सुदीप जी का प्राकृत विद्या में उल्लिखित कथन कहां तक सत्य है यह बिना किसी ठोस प्रमाण के कहना उचित नहीं होगा। मेरी अन्तरात्मा यह स्वीकार नहीं करती है कि डॉ० टॉटिया जैसे गम्भीर विद्वान् बिना प्रमाण के ऐसे वक्तव्य दें। कहीं न कहीं शब्दों की कोई जोड़-तोड़ अवश्य हो रही है। डॉ० सुदीपजी प्राकृत-विद्या जुलाई-सितम्बर ६६ में डॉ० टॉटिया जी के उक्त व्याख्यानों के विचार बिन्दुओं को अविकल रूप से प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं कि “हरिभद्र का सारा योगशतक धवला से है।" है इसका तात्पर्य है कि हरिभद्र के योगशतक को धवला के आधार पर बनाया गया है। क्या टॉटिया जी जैसे विद्वान् को इतना भी इतिहास बोध नहीं हैं कि योगशतक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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