Book Title: Shastravartta Samucchaya Part 8
Author(s): Haribhadrasuri, Badrinath Shukla
Publisher: Divya Darshan Trust

View full book text
Previous | Next

Page 178
________________ [ शास्त्रबार्ता० स्त०८ प्रो० 10 कह कर प्रामाण्य को उपपत्ति में स्वतस्त्वभङ्ग का आपावान उचित नहीं है।' इसलिये शाक्यसिंह बुद्ध के अन्तेवासोने ठीक ही उत्प्रेक्षा की है कि जिस प्रकार 'खरविषाणम्' इत्यादि वाक्य से प्रबलदोषवश अलीक प्रखण्ड खरशृङ्ग का बोध होता है उसी प्रकार कुबासना के दोषवश वेदान्तीनों को घेवान्त वाक्य से अलीक अखण्ड ब्रह्म का बोध होता है। इस उत्प्रेक्षा से स्पष्ट है कि वेवान्तीयों का ब्रह्म खरशृङ्ग के समान अलीक है। उपरोक्त सभी विचारों की समीक्षा करने से यह सुनिश्चित निस्कर्ष प्राप्त होता है कि संसार की जो भी वस्तु उपलब्ध होती है वह स्वरूपसत्तादि धर्मों से संकीर्ण=युक्त प्रौर पररूप से असंकीर्णशून्य होती है और वस्तु जिन परधर्मों से शून्य होती हैं उन परधर्मरूप प्रतियोगी का ज्ञान रहने पर पररूप शून्यतया उसका व्यवहार भी होता है / अतः सारा जगत् सत्-असत् उभयात्मक ही है / जसा कि जैन विद्वानों ने कहा है संसार को प्रत्येक रस्तु दाहा से सन् गौर पररूप से असत् होती है / यदि केवल सत् ही माना जायगा तो सर्वरूप से सत्त्व को प्रापत्ति होगी और यदि वस्तु को असत् ही माना जायगा तो स्वरूप से भी वस्तु का अस्तित्व नहीं हो सकेगा। अत: यह सिद्ध होता है कि सदद्वैत-विज्ञानाद्वैतशन्यातादि सर्वविध अद्रत प्रप्रामाणिक है॥१०॥ व्यख्याकार ने तीन श्लोकों से इस स्तबक का बड़े सुन्दर ढंग से उपसंहार किया है / पहले श्लोक में कहा है कि चार्वाक का मत भवकेशो=वन्ध्यवक्ष जसा है जिससे किसी प्रकार के फल को आशा नहीं की जा सकती। बौद्ध के समस्त बचा अदरी वृक्ष के समान है जो संकड़ों कीटों से संकीर्ण होने के कारण अत्यन्त दुखदायी है। और वेदान्त के सिद्धान्त तालवक्ष के समान है जो अपने रस से मनुष्य में केवल उन्माद पैदा करते हैं। केवल जैनागम ही ऐसा शास्त्र है जो मनुष्य के लिये देववृक्ष-कल्पवृक्ष समान है अत एव अपना कल्याण चाहने वाले प्रत्येक मनुष्य को उस शास्त्र का हो आश्रय लेना चाहिये। दूसरे श्लोक में यह कहा है कि जैन सिद्धान्त सरोज-कमल के समान है जिसका महत्त्व न तो काककल्प धार्थकों को ज्ञात है-और न खरगोश जैसे बौद्धमतावलम्बो को ज्ञात है, न बकसदृश अद्वैतवेदान्तोओं को झात है- किन्तु सम्पन्न जैन यतिओं को जो उसे स्यावाद के मकरन्द रस से भरा हुमा देख कर उसका अनन्यभाव से आसेवन करते हैं। तीसरे पय में व्याख्याकार ने यह कहा है कि अन्य दर्शनों पर दृष्टि डालने पर यह ज्ञात होता है कि फिली दर्शन में भेद का खण्डन किया गया है असे अद्वैतवेदान्त में; और कहीं अभेदवाद का खण्डन फिया गया है, जैसे द्वैतवादो दर्शन में; किसी दर्शन को आत्मा का ही परिचय नहीं है जैसे बौद्ध दर्शन को; किसी में कृपासोन्दर्य का विरह है-जैसे निरीश्वरवादी सांस्य और मीमांसा दर्शन में। इस प्रकार आश्चर्य है कि ऐसा कोई भी परदर्शन नहीं है जिसमें इस प्रकार कलंक शंका नहो। अतः जिन लोगों ने स्याद्वाद दर्शन का आश्रय लिया है वह उनके सुकृत समूह का महान और सुन्दर परिणाम है। [ यस्यासन्० इस श्लोक का अर्थ प्रथम स्तबक में देख लेना] - 8 वां स्तयक समाप्त : वह ज्ञान कवलस नम:

Loading...

Page Navigation
1 ... 176 177 178