Book Title: Samraicch Kaha Part 2
Author(s): Haribhadrasuri, Rameshchandra Jain
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 442
________________ ८९२ [समराइच्चकहा देवंगाइवत्थपूयाए सवित्तकम्मुज्जलं बद्धेण वरचित्ताडियचंदोदएणं ओलंबिएहि पंचवणियसुरहिकुसुमदामेहिं पज्जलियाहिं मणिप्पदोवियाहिं धुव्वंतीहि अणवरयधुन्वमाणकालागरुकप्पूरपउराहि धवघडियाहि गंडोवहाणयालिंगणिसमेयाए तूलियाए सोविओ दंतमयपल्लंके । कओ उचिओवयारो। पाइओ महमाहवाइपवरासवाई। एवं च पंचविहं विसयसुहमणुहवंतस्स अइक्कंतो कोइ कालो। अन्नया च विन्नत्तो अणेण राया - देव, गच्छामि । राइणा भणियं-जं रोयइ देवाणुप्पियस्स । तओ दाऊणमणग्धेयं दविणजायं चेलाइयं च महग्घमुल्लं दिन्ना से सहाया पच्चइयपुरिसा। भणिया ते राहणा-हरे पल्लिवई पल्लिपएसे मोत्तणागच्छह ति। तेहि भणियं-जं देवो आणवेइ। तओ पणमिऊण नरवइं गओ सबरणाहो पत्तो कइवयवियहेहिं नियपल्लि। विसज्जिया रायपुरिसा। पविट्रो नियगेहे । समागओ तस्स समीवं सबरलोओ। पुच्छिओ हिं-कत्थ तुम गओ सि, कहिं वा ठिओ सि एत्तियं कालं, किं वा तए लद्धं । तओ साहिओ तेण रायदरिसणाइओ पल्लिपवेसपज्जवसाणो नियवुत्तंतो। तओ अहिययरं सकोउहल्लो पुच्छइ तं जणसमूहो । धवलितं ते देवाङ्गादिवस्त्रपू गया सचित्रकर्म (णि) उज्ज्वल (ले) वरचित्रापतितचन्द्रोदयेन अवलम्बितैः पञ्चणिकसरभिकसुमदामभि: प्रज्वलिताभिर्मणिप्रदीपिकाभिधू यमानाभिरनवरतधप्यमानकालागहकप रप्रचराभिधू पघटिकाभिर्गण्डोपधानालिङ्गनीसमेतायां तूलिकायां स्वापितो दन्तमयपल्यड़े। कत उचितोपचारः । पायितो मधुमाधवादिप्रवरासवानि । एवं च पञ्चविध विषयसुखमनभवतोऽतिक्रान्तः कोऽपि कालः । अन्यदा विज्ञप्तोऽनेन राजा । देव ! गच्छामि । राज्ञा भणितम् -यद रोचते दवानप्रियाय । ततो दत्त्वाऽनयं द्रविण जातं चेलादिकं च महार्घमूल्यं दत्तास्तस्य सहायाः प्रत्ययितपरुषाः भणितास्ते राज्ञा - अरे पल्लीपति पल्लोप्रदेशे मुक्त्वाऽऽगच्छतेति । तैर्भणितम-यद देव आज्ञापयति। ततः प्रणम्य नरपतिं गतः शबरनाथः प्राप्तः कतिपय दिवसैनिजपल्लीम। विसजिता राजपुरुषाः। प्रविप्टो निजगेहे। समागतस्तस्य समीपं शबरलोकः । पृष्टस्तैः - कूत्र त्वं गतोऽसि, कत्र वा स्थितोऽसि एतावन्तं कालम्, किं वा त्वया लब्धम् । ततः कथितस्तेन राजदर्शनादिकः पल्लोप्रवेशपर्यवसानो निजवृत्तान्तः । ततोऽधिकतरं सकुतूहलः पृच्छति तं जनसमूहः किरणें पड़ने से उज्ज्वल लग रहा था, पाँच रंग की सुगन्धित फूलमालाएं वहाँ लटकाई गयी थीं, मणिनिर्मित दीपक जलाए गये थे, निरन्तर धुआँ छोड़नेवाले काले अगरु, कपूर और प्रचुर धूप के छोटे-छोटे मिट्टी के घड़ों से यक्त था। हाथीदांत से बने हुए रूई भरे विस्तर गण्डोपधान (गाल के नीचे का तकिया) और आलिंगनी घटनों आदि के नीचे रखने का तकिया) से युक्त पलंग पर उसे सुलाया। योग्य सेवा की। मधु, मद्य आदि श्रेष्ठ रस पिलाये। इस तरह पाँच प्रकार के विषयों के सुख का अनुभव करते हुए, समय बीत गया। एक बार इसने राजा से निवेदन किया-'महाराज ! जा रहा हूँ।' राजा ने कहा- 'जो देवानुप्रिय को अच्छा लगे ।' अनन्तर बहुमूल्य धन, सोना, वस्त्रादिक देकर उसके साथ विश्वस्त पुरुष भेज दिये। उनसे राजा ने कहा- 'अरे शबरस्वामी को शबरस्थान में पहुँचाकर आओ।' उन्होंने कहा-'जो महाराज की आज्ञा।' अनन्तर राजा को प्रणाम कर शबरनाथ चला गया। कुछ दिन में अपनी बस्ती में पहुंच गया। राजपुरुषों को वापस भेज दिया। अपने घर में प्रवेश किया। उसके पास शबर लोग आये। उन्होंने पूछा- 'आप कहाँ चले गये थे ? इतने समय तक कहाँ रहे अथवा आपने क्या प्राप्त किया?' अनन्तर उसने राजा के दर्शन से लेकर शबर बस्ती में प्रवेश करने तक का अपना वृत्तान्त कहा । तब अत्यधिक कौतूहल से युक्त होकर लोगों के समूह ने उससे पूछा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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