Book Title: Samish Niramish Ahar
Author(s): Sukhlal Sanghavi
Publisher: Z_Darshan_aur_Chintan_Part_1_2_002661.pdf

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Page 27
________________ सामिष-निरामिष-आहार का परिशिष्ट हीनयान और महायान स्थविरवाद और महायान-ये दोनों एक ही तथागत बुद्ध को और उनके उपदेशों को मानने वाले हैं फिर भी दोनों के बीच इतना अधिक और तीव्र विरोध कभी हुआ है जैसा दो सपत्नियों में होता है। ऐसी ही मानसिक कटुता, एक ही भगवान् महावीर को और उनके उपदेशों को मानने वाले श्वेताम्बर, दिगम्बर श्रादि फिरकों के बीच भी इतिहास में पाई जाती है। यों तो भारत धर्मभूमि कहा जाता है और वस्तुतः है भी तथापि वह जैसा धर्मभूमि रहा है वैसा धर्मयुद्धभूमि भी रहा है। हम इतिहास में धर्मकलह दो प्रकार का पाते हैं । एक तो वह है जो भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के बीच परस्पर रहा है, दूसरा वह "है जो एक ही सम्प्रदाय के अवान्तर-भीतरी फिरकों के बीच परस्पर रहा है । पहले का उदाहरण है वैदिक और अवैदिक-श्रमणों का पारस्परिक संघर्ष जो दोनों के धर्म और दर्शन-शास्त्र में निर्दिष्ट है | दूसरे का उदाहरण है एक ही औपनिषद परम्परा के अवान्तर भेद शाङ्कर, रामानुजीय, माध्व, वल्लभीय आदि फिरकों के 'बीच की उग्र मानसिक कटुता । इसी तरह बौद्ध और जैन जैसी दोनों श्रमस परम्पराओं के बीच जो मानसिक कटुता परस्पर उग्र हुई उसने अन्त में एक ही 'सम्प्रदाय के अवान्तर फिरकों में भी अपना पाँव फैलाया । इसी का फल स्थविरवाद और महायान के बीच का तथा श्वेताम्बर और दिगम्बर के बीच का उग्र विरोध है। बुद्ध-निर्वाण के सौ वर्ष बाद वैशाली में जो संगीति हुई उसमें स्थविरवाद और महासंधिक ऐसे दो पक्ष तो पड़ ही गए थे। अागे तीसरी संगीति के समय अशोक के द्वारा जब दोनों पक्षों के बीच समाधान न हुआ तो विरोध की खाई चौड़ी होने लगी। स्थविरवादियों ने महासंघिकों को 'अधर्मवादी' तथा 'पापभिन्' कह कर बहिष्कृत किया । महासंघिकों ने भी इसका बदला चुकाना शुरू किया । क्रमशः महासंधिकों में से ही महायान का विकास हुआ ! महायान के प्रबल पुरस्कर्ता नागार्जुन ने अपने 'दशभूमि विभाषा शास्त्र में लिखा है कि जो श्रावकमान और प्रत्येकयान में अर्थात् स्थविरवाद में प्रवेश करता है. वह सारे लाभ को नष्ट कर देता है फिर कभी बोधिसत्त्व हो नहीं पाता। नागार्जुन का कहना है कि Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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