Book Title: Samaysar
Author(s): Kundkundacharya, 
Publisher: Bharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir

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Page 12
________________ दुःख है, सो दुःखोंका अत्यन्लाभाव हो जाता है। इसलिये भेदविज्ञानकी तब तक निरन्तर भावना करनी चाहिये जब तक कि ज्ञान परसे बिलकुल न हट जावे और ज्ञान में ही प्रतिष्ठित न हो जाये। निराधिकार विकार के झड़नेका नाम निर्जरा है। निर्जरा दो प्रकार की है-(१) भावनिर्जरा (२) थ्यनिर्जरा-सुखदुःख राग द्वेषादि बिभाय जो उदित हए, वे बंधने कारण न बनें और झड़ जावें इसका नाम तो भावनिर्जरा है और इसी कारण अन्य बंधका कारण न बन कर काँका व अन्य कमोका निष्फल झड़ जाना सो दृष्य-निर्जरा है। । ज्ञानका ऐसा ही सामथ्र्य है कि कर्मविपाकको भोगता हआ भी ज्ञानी कोसे नहीं बॅघता है। जैसे कि ताधिक, मान्त्रिक अथवा विषवंद्य पुरुष विषको खाता हुआ भी मरणको प्राप्त नहीं होता। वैराग्य में भी ऐसा ही सामर्थ्य हैं । वस्तुत: ज्ञान और पैराग्य अलग-अलग तश्क नहीं है, विधिरूपसे देसनेपर ज्ञान प्रतिष्ठित है और रागनिषेधको ओरसे देखनेपर वैराग्य प्रतिष्ठित है। सम्यग्दृष्टिका मुख्य विषार एक यह भी रहता है कि जो लोभ क्रोधादि प्रकृति वाले कर्म होते हैं, उन कमौके उदयके निमितसे उत्पन्न हुये रामाविक भाव परभाव हैं। ये मेरे स्वभाष नहीं हैं। मैं तो टंकोरकीर्णवत् निश्चल स्वतः सिद्ध एक शापक स्वभावरूप हूं। इस विचार-बलसे नानी परभाघोंसे विरक्त रहकर उनको छोड़ देता है। रागादिभाद बाराका स्वपद नहीं , पय विजय ही भान अत्यनावके विरुद्ध है, विषम है. अनेकरूप हैं, क्षणिक हैं और व्यभिचारी हैं। कभी कोई भाव रहे, कभी कोई भाव न रहे, दूसरा रहे। इस कारण स्थायी रूपसे आस्मामें स्थान नहीं पाते अर्थात् अस्थायी है। किन्तु ज्ञानस्वभाव आत्माका स्वपद है; क्योंकि यह वानस्वभाव आत्मस्वभाव है, सम अर्थात् नियत है, एकरूप है, नित्य है । अव्यभिचारी अर्थात सनबरत सदा आत्मसमें रहता है। इस ही कारण ज्ञानस्वभाव स्थायीरूपसे आत्मामें स्थान पाता है। इसलिए है आत्मनु ! इस एक ज्ञानस्वभावका ही अनुभव करो। जिसमें रंचमात्र भी विपत्ति नहीं रहती। इस ज्ञानस्वभावके जितने परिणमन है, उन परिणमनोंके ज्ञान-द्वारसे परिपूर्ण ज्ञानस्वभावको ही देखो । इस शानभावके आश्रयसे ही शानकी प्राप्ति है, अन्य क्रियाओंसे नहीं। इस ज्ञानभावके आश्रयके बिना महान तपों का भार भी सहे तो भी मुक्ति नहीं होती। झानोपयोगी आत्मा निष्परिग्रह है, क्योंकि परिग्रह तो वास्तव में इच्छा ही है, सो ज्ञानीके इच्छाका आदर ही न राग ही नहीं, केवल इच्छाका ही नहीं, किन्तु समस्त विभावोंका जानीके ममत्व नहीं, बादर नहीं, ज्ञानी किसी भी परमावको नहीं चाहता । इसी कारण बाह्य विषयोंकी चाह नहीं। ज्ञानी आत्मा प्रतीत भोगोंका तो ख्याल ही क्या करेगा, वह तो वर्तमान गोगोंमें भी वियोगबुद्धिसे प्रवमान हो रहा है। यो वियोगधुद्धिसे रहे, वह परिमही नहीं है। भविष्यत् भोयकी चाहभी अनेक कारणोंसे शालीक नहीं है (१) ज्ञानीके बस्तुस्वभावकी ओर इष्टि रहा करती है सो निदानको अवसर ही नहीं मिलता। (२) वस्तुस्वातंत्र्यकी प्रतीतिके कारण किसी भी बाह्य पदार्थसे शानीको हितकी आशा ही नहीं है। (३) ज्ञानीके यह दढ़ निश्चय है कि इच्छाभाव व भोगभाव में दोनों भाव एक समय में हो ही नहीं सकते; क्योंकि जब किसी वस्तुकी चाह है तब तो उस वस्तुका भोग नहीं और कदाचित् उस वस्तुका भोग हो तो तद्विषयक चाह नहीं कि यह मिल जावे। अब इच्छा न भोग दोनों एक समयमें मिल नहीं सकते तो फिर चाह ही क्यों की जाये। मानी आत्मा सर्व प्रकारके राग-रसका छोड़नेवासा होता है। इसी कारण कोई भाभी कभके मध्य भी पड़ा हो, तो भी कर्मसे लिप्त नहीं होता। जैसे कि सुवर्णका जंगसे लिप जानेका स्वभाग नहीं है, तो कीचड़के बीच पड़ा हा सोना जंग नहीं खाता। लोहका जंगसे लिप जानेका स्वभाव है, सो कीचड़के बीच पडा हा लोहा जंग खा

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