Book Title: Pravachansaroddhar Part 2
Author(s): Nemichandrasuri
Publisher: ZZZ Unknown

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Page 6
________________ wwwgHREEMAI जिन प्रवचनमारोदारे सटीक सार प्रस्तावना द्वितीयः कृति के रचयिता महापुरक में 'समंद समानार में' की उक्ति को चरितार्थ करने के लिए कितना अपूर्व रचनाकौशल्य दिखलाया है। _प्रस्तुत प्रग्य पद्य में है और समुचा ग्रन्थ प्राकृत भाषा में है, सिर्फ एक श्लोक संस्कृत में है (क्रमा९७१)। बहुलतया प्रार्या छंव का प्रयोग गाथायों में किया गया है। कतिपय स्थलों पर अन्य छन्द भी प्रयुक्त किये गये है। अन्धकार महर्षि प्रथकार महषि है प्राचार्य श्री नेमिचन्द्रसूरिजी । अन्य के अन्त में समय नहीं दिया है लेकिन उनकी ही एक शन्य कृति 'प्रणतनाह बरिय' वि.सं.१२१६ में रची गई है। इस पर से ग्रन्धकार का समय १२-१३वी शतो निश्चित होता है । प्राप के कृतित्व से विभूषित अन्य ग्रन्थ जीवकुलक है, जो कि प्रस्तुत अन्य के २१४ वे द्वार में समाविष्ट हो जाता है। 'पर्णतनाह चरिय' के अलावा दूसरे मी चरित्र का प्रापने निर्माण किया था ऐसा जपवेश माला' की प्रशस्ति (प्रशस्ति संग्रह, पृ. २६) से ज्ञात होता है, लेकिन वह प्रत्य प्रश्न तक अप्राप्य है। प्राचार्य प्रवर श्री नेमिचन्द्र सूरिजी को पट्ट परम्परा उन्होंने प्रणतनाह चरिय' की प्रशस्ति में दी है। पहले खण्ड के प्राक-कथनम् (संस्कृत प्रस्तावना) में हमने इस प्रशस्ति का प्रावश्यक पाठ दिया है। टोकाकार प्राचार्य श्री सिद्धसेन सूरिजी के सम्मुख इस प्रन्थ की १५६६ गाथाएं होगी ऐसा लगता है, क्योंकि इतनी ही गायात्रों को व्याख्या टोका में है। हमने जिसका उपयोग किया है इस सिर्फ मूल गाथानों वाली ताडपत्रीय प्रत में व अन्य प्रत में हमने कुछेक प्रधिक गाथा बेखो, जो कि मुद्रित . ला, संस्करण में नहीं है ऐसी गापाएं हमने उस उस स्थल पर टिप्पण में 'अमुक प्रति में यहां अधिक गापा मिलती है' ऐसे निर्देश पूर्वक की है । (ब्रष्टव्यः भा. २ पृ. १४६, मा २१ ४०६, मा २ पृ. ४०८) micss Prime

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