Book Title: Paumchariu Part 3
Author(s): Swayambhudev, H C Bhayani
Publisher: Bharatiya Gyanpith
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पउमचरिड
असि रयणु लहउ तियस? बलिउ । बन्दहिह झोच्चणु दरमलिउ ॥६॥ कूचार गय खर-दूसणहूँ । अजयहुँ अय-लरिछ-विहसणहुँ ॥७॥ अभिट्ट ते वि सहुँ लक्खयोग 1 तेण वि दोहाविय तवणे ॥८॥
घत्ता
केण वि मणे भमरिस-कुद्धऍण हिय गेहिणि बयों राहवहाँ । पाडिउ जहाइ लगन्तु कुठ एसिड कारणु आहबहो' ||६॥
[३] एदिय णिसुणे वि संगाम-गइ । चिन्तावित किलिम्धाहिवाई ॥१॥ 'किर पहसमि गम्पि आहुँ सरणु । किड दइवें तहु मि णकर मरणु ॥२॥ एहरे अवसर को संभरभि 1 किं हणुअहो सरणु पईसमि ॥२ तेण वि रिड जिणे वि | सकियड । पलिउ हउँ णिरस्धु कियउ ॥४॥ किं भवभत्थिमई दवयणु । णं गं तिय-लम्पहु लुन्द्र-मणु ॥५॥ अम्हई विणिवाऍवि वे वि जण ! सहुँ रज्जे अप्पुणु लेइ धण ॥६॥ खर - दूसप्प - देह • विमाणहुँ । वह सरणु जामि रहु-गन्दगहुँ ॥७॥ चिन्तेविणु विक्किावाहित्रण ! हकारिउ मेहणाउ णित्रण ॥६॥ "ते गम्पि विराहिउ एम भणु । दुरचइ सुगीउ आउ सर । पिय-बयहिं दृड विसज्जियउ । गड मच्छर-माण-विधज्जियउ ॥१०॥ पापाल-ला-पुरै पहसर वि । तें वत्त विराहिड मोहरेवि 1980
पत्ता 'सुर्गाउ सुतारा-कारर्गेण विडसुग्गीवें घश्चियउ । किं पाइसरहु कि म पइसरउ तुम्हहें सरशु समझियड' ॥१२॥

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