Book Title: Pannavana Sutra
Author(s): Shyamacharya, 
Publisher: ZZZ Unknown

View full book text
Previous | Next

Page 576
________________ सावनारकी पलिपूर्वक मनुष्पधर सीऊडूय रे वलीनूर करें न जाइतेका वनइन घी चोष नए गु० एकरावर मारणातिकसमुद्र घातकर इवेप परं तिहान कहि पराई मोष काइते ला एक दो० देवि लवकरईते श्राश्रीणितव करते श्राश्रावसघात संध्या वेलानकर वानरको आता सुष्पाता किसान जहाँ कः कषायसघात ताऊस एका रा लाश्री इ ऊद की वा इत्या ऊइतेहनइ तावनस्त विंगलिश रामाऊदामारतिय सम्रग्घा ताण व ऊस्म रतियाला सावरकारण विण्उत्तरियामानय हो। कावारमाणिस्सारमालिया परमे तीसादडगानापियवा विसम्रग्यताऊदा ससारस सग्द्यता तदा निश्वासासाला क दिजान गयो। एवरंडा एतिस्तच वासाद उगाना पिया।बतिघरक बियरतविचवास वा सादरुगाला शिक्षा कहन नाक दतिया ਸੁਭਾਗ एकादिकजा शरमाणियात्रा वरमसत्र प्रतीताका वादावा| कासगतनिकरतियापार त्रिवानाकारता शिवा प्रज्ञावासथ २३८ स्मरणरश्य वज्रणेताइ मनारकी नो वासु allalएगाममस यमाशकरनियाडा गाए गए प्रतिश्विकस्मतिस्मिगिऊदको ० से रखे जाऊ वचने ती एक अनघाना रका निकारकड]][ग] कस्मतिसित ऊसा शिऊदे को वादा कायल गइवानका पाइजा विकस्मइन घास्मृति घु वाकायत तिर्यचप चेदी मनुष्य वाउदत वा लमेतरको तिका वैमा |रतेहा विकासस वासवीसादडगाव नप्रघवी सूरकुम एवंसबजी दारा सेखलागि होम एस समएस ते श्रतीता कस्पतिश्विकम्मति एविस्म अाकाशादावतिभिवा) का सत्रारिपारकमा करमाणियारमाणिते एग मे गमला रयस्नाए २३यते। के रतिया के लि समुग्याता तान अनुजावते बाम वैक्का नघातिमनार कोनी व २४ दे कर सूच जावा ० १० सबनपतिच्येत रजोतिषा वैमाना कपरस्पर स्वस्वाने एकोतरिकापर खाने से रखे या दयो वक्तव्याचा कार्य यचे) तिर्येच मनुष्य परस्पर स्वस्वानेवर स्वाने कुत रिकातेय. तेऊससमुझ्यात हा मारातिक वनद विशेष स्म जेनस समुई घात बने इस रवा ने कई पर मुश्यात वदनै גת

Loading...

Page Navigation
1 ... 574 575 576 577 578 579 580 581 582 583 584 585 586 587 588 589 590 591 592 593 594 595 596