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अध्यात्म के नय
कर्ता-भोक्तापना - जीव पर्यायरूप भाव संवर, भाव निर्जरा और भाव मोक्ष पदार्थों का कर्ता-भोक्ता इस नय से कहा जाता है। छद्मस्थ अवस्था में केवलज्ञानादि भावों का और पूर्ण शुद्धोपयोग का कर्त्ता तथा परमानन्द का भोक्ता इसी नय से कहा जाता है।
नाम की सार्थकता - इस नय का प्रयोग निर्मल परन्तु अपूर्ण पर्याय के साथ अभेदता में ही होता है; इसलिए इसे अपूर्णता की अपेक्षा एकदेश' निर्मलता-शुद्धता की अपेक्षा 'शुद्ध' एवं अपनी पर्याय होने से 'निश्चय' और अंश का कथन करने के कारण 'नय' कहा जाता है। इसप्रकार इसका एकदेश शुद्धनिश्चयनय नाम सार्थक है।
गुणस्थान - अपूर्ण, शुद्ध पर्याय को ग्रहण करने वाला यह नय चतुर्थ गुणस्थान से बारहवें गुणस्थान तक होता है।
प्रयोजन - साधक दशा को बताने वाले इस नय को नहीं मानने से साधक दशा का ही अभाव हो जाएगा। साधक दशा का नाम ही मोक्षमार्ग है; अतः मोक्षमार्ग ही न रहेगा। मोक्षमार्ग नहीं होगा तो मोक्ष का भी अभाव हो जाएगा।
विकारी पर्याय यद्यपि अपने में ही उत्पन्न हुई है, अतः यह नय विकार से हटाने के लिए एकदेश निर्मलपर्याय में अभेद स्थापित करता है, मुक्ति मार्ग के साथ अभेदता बताता है। ___ संक्षेप में कहें तो विकारी पर्याय से पृथकता स्थापित कर एकदेशनिर्मल पर्याय में ही त्रिकाली ध्रुव की एकता स्थापित करना इस नय का प्रयोजन है।
हेयोपादेयता - एकदेश निश्चयनय का विषय एकदेश निर्मल अर्थात् अपूर्ण पवित्र होने के कारण ही ध्याता पुरुष इसमें अहं स्थापित नहीं
साक्षात्शुद्धनिश्चयनय करता क्योंकि अपूर्णता के लक्ष्य से पर्याय में पूर्णता की प्राप्ति नहीं होती; अतः आत्मा में एकत्व स्थापित करने की दृष्टि से यह नय हेय है, किन्तु इसका विषय मोक्षमार्ग रूप पर्याय से परिणत आत्मा है, जो कि मोक्षमार्ग रूप होने से साधन है। साधन होने से प्रगट करने की अपेक्षा यह नय एकदेश उपादेय है।
(ii) साक्षात् शुद्धनिश्चयनय स्वरूप और विषयवस्तु - निरूपाधिक गुण-गुणी और पूर्ण शुद्ध केवलज्ञानादि पर्यायों से आत्मा को अभिन्न बताने वाले नय को साक्षात् शुद्धनिश्चयनय कहते हैं। जैसे - जीव को शुद्ध केवलज्ञानादिरूप कहना । यह नय पूर्ण शुद्ध गुण-पर्यायों से एकता स्थापित करता है, क्षायिक भावों के साथ अभेदता बताता है। इसी अपेक्षा क्षायिक सम्यग्दृष्टि को 'दृष्टि मुक्त' कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि दृष्टि अपेक्षा वह सिद्ध ही हो गया।' ___यह नय सांसारिक सुख-दुःख और राग-द्वेष की उत्पत्ति से ही इंकार करता है।
संक्षेप में कहें तो इस नय का विषय मोक्षरूप से परिणत आत्मा है, जो कि मोक्षरूप, परिपूर्ण सुखरूप होने से साध्य है।
कर्ता-भोक्तापना - जीव के क्षायिक भावों का कर्ता-भोक्ता इसी नय से कहा जाता है। ___नाम की सार्थकता - चूँकि इस नय का प्रयोग साक्षात् सुख स्वरूप पूर्ण पर्याय के साथ अभेदता में ही होता है। अतः पूर्णता की अपेक्षा 'साक्षात्', शुद्धता की अपेक्षा 'शुद्ध' एवं अपनी पर्याय होने से 'निश्चय'
और अंग का कथन करने के कारण 'नय' कहा जाता है। इसप्रकार इसका साक्षात् शुद्धनिश्चयनय नाम सार्थक है। १. परमभावप्रकाशक नयचक्र, पृष्ठ-१०७ २. वही, पृष्ठ-१०९ ३. वही, पृष्ठ-८५ ४ . वही, पृष्ठ-९२ ५. वही, पृष्ठ-८१
२
१. परमभावप्रकाशक नयचक्र, पृष्ठ-९३ ३. वही, पृष्ठ-९०
. वही, पृष्ठ-८८ ४. वही, पृष्ठ-९६
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