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मृत्यु समय, पहले और पश्चात...
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मृत्यु समय, पहले और पश्चात्...
केल्क्युलेशन लगाएँ, उसके जैसा यह आबादी का केल्क्युलेशन लगाते
बच्चों को दुःख क्यों? प्रश्नकर्ता : निर्दोष बच्चे को शारीरिक वेदना भुगतनी पड़ती है? उसका क्या कारण है?
दादाश्री : बच्चे के कर्म का उदय बच्चे को भगतना है और 'मदर' को वह देखकर भुगतना है। मूल कर्म बच्चे का, उसमें मदर की अनमोदना थी. इसलिए 'मदर' को देखकर भुगतना है। करना, करवाना और अनुमोदन करना-ये तीन कर्मबंधन के कारण हैं।
मनुष्य भव की महत्ता मनुष्यदेह में आने के बाद अन्य गतियों में जैसे कि देव, तिर्यंच अथवा नर्क में जाकर आने के बाद फिर से मनुष्य देह प्राप्त होती है। और भटकन का अंत भी मनुष्य देह में से ही मिलता है। यह मनुष्यदेह जो सार्थक करना आया तो मोक्ष की प्राप्ति हो सके ऐसा है और नहीं आए तो भटकने का साधन बढ़ा दे, वैसा भी है ! दूसरी गतियों में केवल छूटता है। इसमें दोनों ही हैं। छूटता है और साथ साथ बंधता भी है। इसलिए दुर्लभ मनुष्यदेह प्राप्त हुआ है, तो उससे अपना काम निकाल लो। अनंत अवतार आत्मा ने देह के लिए बिताए। एक अवतार यदि देह आत्मा के लिए निकाले तो काम ही हो जाएगा!
मनुष्यदेह में ही यदि ज्ञानी पुरुष मिलें तो मोक्ष का उपाय हो जाए। देवता भी मनुष्यदेह के लिए तरसते हैं। ज्ञानी पुरुष से भेंट होने पर, तार जुड़ने पर, अनंत जन्मों तक शत्रु समान हुआ देह परम मित्र बन जाता है! इसलिए, इस देह में आपको ज्ञानी पुरुष मिले हैं, तो पूरा-पूरा काम निकाल लो। पूरा ही तार जोड़कर तड़ीपार उतर जाओ।
अजन्म-अमर को आवागमन कहाँ से? प्रश्नकर्ता : परन्तु आवागमन का फेरा किसे है?
दादाश्री : जो अहंकार है न, उसे आवागमन है। आत्मा तो मूल दशा में ही है। अहंकार फिर बंद हो जाता है, इसलिए उसके फेरे बंद हो जाते है!
फिर मृत्यु का भी भय नहीं प्रश्नकर्ता : मात्र यह सनातन शांति प्राप्त करे तो वह इस जन्म के लिए ही होती है या जन्मों जन्म की होती है?
दादाश्री : नहीं। वह तो परमानेन्ट हो गई, वह तो। फिर कर्ता ही नहीं रहा. इसलिए कर्म बंधते नहीं। एकाध अवतार में या दो अवतारों में मोक्ष होता ही है, छुटकारा ही नहीं है, चलता ही नहीं है। जिसे मोक्ष में नहीं जाना हो, उसे यह धंधा ही करना नहीं चाहिए। यह लाइन में पड़ना ही नहीं। जिसे मोक्ष नहीं पसंद हो, तो इस लाइन में पड़ना ही नहीं।
प्रश्नकर्ता : यह सब 'ज्ञान' है, वह दूसरे जन्म में जाए, तब याद रहता है क्या?
दादाश्री : सब उसी रूप में होगा। बदलेगा ही नहीं। क्योंकि कर्म बंधते नहीं, इसलिए फिर उलझनें ही खड़ी नहीं होती न!
प्रश्नकर्ता : तो इसका अर्थ ऐसा हुआ कि हमारे गत जन्म के ऐसे कर्म होते हैं, जिन्हें लेकर गुत्थियाँ ही चलती रहती हैं?
दादाश्री : पिछले अवतार में अज्ञानता से कर्म बंधे, उन कर्मों का यह इफेक्ट है अब। इफेक्ट भोगने पड़ते हैं। इफेक्ट भोगते-भोगते, फिर यदि ज्ञानी मिले नहीं, तो फिर से नये कॉज़ेज़ और परिणाम स्वरूप नये