Book Title: Mahamantra Namokar Vaigyanik Anveshan
Author(s): Ravindra Jain
Publisher: Megh Prakashan

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Page 232
________________ लिखकर पैर से मिटा दिया । बस व्यन्तर की बात बन बैठी । मन्त्र - का प्रभाव तुरंत समाप्त हो गया । तुरन्त व्यन्तर ने चक्रवर्ती को मारकर समुद्र में फेंक दिया । इस तरह उसने बदला ले लिया । अनादर करने पर महामन्त्र का प्रभाव नष्ट हो जाता है। बल्कि ऐसे व्यक्ति का अपना शरीर बल और मनोबल भी क्षीण हो जाता है । णमोकार मन्त्र निरादर के कारण चक्रवर्ती को सप्तम नरक में जाना पड़ा । मन की पवित्रता, उद्धेश्य की पवित्रता और आस्था इस मन्त्र के लिए परमावश्यक है । भक्त अज्ञानी हो, रुग्ण हो, उचित आसन से न बैठा, शारीरिक स्तर पर अपवित्र भी हो तो भी क्षम्य है । महामन्त्र ऐसे व्यक्ति की भी रक्षा करता है, और उसे शक्ति प्रदान करता है । परन्तु जानबूझकर उपेक्षा, और निरादर करनेवालों को मन्त्र-भक्त रक्षक देवी-देवता कदापि क्षमा नहीं करते । मन्त्र सिद्धि और साधना में परमावश्यक है भीतरी ईमानदारी सच्ची श्रद्धा और विशुद्ध एकाग्र ध्यान | उत्तर : " इत्थं ज्ञात्वा महा भव्याः, कर्तव्यः परया मुदा । सारः पंच नमस्कारः, विश्वासः शर्मदः: सताम् ॥” प्रश्न १०७. महामन्त्र णमोकार की साधना का मूल भक्ति है और भक्ति ही सम्यग्दर्शन की जननी है - समझाइए | भक्ति मूल रूप में और अन्तिम रूप में मुक्ति का कारण है । आराध्य (परमात्मा) के रूप और गुणों की वंदन, नमन, स्मरण, भजन, कीर्तन एवं अर्चना द्वारा स्वयं में अवतारणा करना भक्ति है। सच्चे देव में अडिग, पूर्ण श्रद्धा सम्यग्दर्शन है । सम्यग्दर्शन भक्ति से ही सम्पन्न होता है । स्पष्ट है कि सम्यग्दर्शन मोक्ष की पहली सीढ़ी । इस सीढ़ी तक भक्ति द्वारा ही पहुँचा जा सकता है । इस पारमार्थिक भक्ति से दर्शन मोहनीय का नाश होता है । यह भी स्पष्ट है कि सम्यग्दर्शन के अभाव में सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र £231&

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