Book Title: Karmgranth 01 02 03
Author(s): Devendrasuri, Manitprabhsagar, Ratnasensuri
Publisher: Ashapuran Parshwanath Jain Gyanbhandar

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Page 44
________________ सम्यग्दृष्टि मनुष्य तीर्थंकर नामकर्म की प्रकृति बाँध सकते हैं- पर्याप्त तिर्यंच नहीं । पाँचवें से आगे के गुणस्थानकों में कर्मस्तव नाम के दूसरे कर्मग्रंथ में बताए गए अनुसार कर्मप्रकृतियाँ बाँधते हैं । अपर्याप्त तिर्यंच व मनुष्य तीर्थंकरनाम आदि 11 प्रकृतियों को छोडकर 109 का बंध करते हैं ॥१०॥ निरयव्वसुरा नवरं, ओहे मिच्छे इगिंदितिग- सहिआ; । कप्पदुगे विय एवं, जिणहीणो जोड़ - भवण - वणे ॥११॥ भावार्थ : देवों को नरकगति की तरह बंध होता है, परंतु सामान्य से व मिथ्यात्व गुणस्थानक में एकेन्द्रिय त्रिक सहित बंध होता है । प्रथम दो देवलोक - सौधर्म व ईशान में इस तरह बंध होता है तथा ज्योतिष, भवनपति और व्यंतर में तीर्थंकर नामकर्म सिवाय बंध होता है ॥ ११ ॥ रयणुव्वसणंकुमाराइ - आणयाई उज्जोयचउ - रहिआ; । अपज्जतिरिअव्व नवसय, मिगिंदिपुढविजलतरुविगले ॥१२॥ भावार्थ : सनत्कुमार आदि देवता रत्नप्रभा नारकी की तरह बंध करते हैं । आनत आदि देवता उद्योत चतुष्क रहित बंध करते हैं । एकेन्द्रिय पृथ्वीकाय, अप्काय, वनस्पतिकाय और विकलेन्द्रिय जीव अपर्याप्त तिर्यंच की तरह बंध करते हैं ॥ १२ ॥ बंध स्वामित्व - तृतीय कर्मग्रंथ ४३

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