Book Title: Jambudwip Pragnapati
Author(s): Devendramuni
Publisher: Z_Jinavani_003218.pdf

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Page 9
________________ 292 जिनवाणी- जैनागम साहित्य विशेषाङ्क प्रारम्भ हो जाता है। कर्मभूमि से मानव का प्रस्थान भोग भूमि की ओर होना है । इस प्रकार द्वितीय वक्षस्कार में अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल का निरूपण हुआ | यह निरूपण ज्ञानवर्द्धन के साथ ही साधक के अन्तर्मानिस में यह भावना उत्पन्न करना है कि मैं इस कालचक्र में अनन्त काल से विविध योनियों में परिभ्रमण कर रहा हूँ। अब मुझे ऐसा उपक्रम करना चाहिये जिससे सदा के लिये इस चक्र से मुक्त हो जाऊँ । तृतीय वक्षस्कार विनीता - जम्बुद्वीपप्रज्ञप्ति के तृतीय वक्षस्कार में सर्वप्रथम विनीता नगरी का वर्णन है। उस विनीता नगरी की अवस्थिति भरतक्षेत्र स्थित वैताढ्य पर्वत के दक्षिण के ११४,११ / १९ योजन तथा लवणसमुद्र के उत्तर में ११४,११/१९ योजन की दूरी पर, गंगा महानदी के पश्चिम में और सिन्धु महानदी के पूर्व में दक्षिणार्द्ध भरत के मध्यवर्ती तीसरे भाग के ठीक बीच में है । विनीता का ही अपर नाम अयोध्या है। जैन साहित्य को दृष्टि से यह नगर सबसे प्राचीन है। यहाँ के निवासी विनीत स्वभाव के थे। एतदर्श भगवान ऋषभदेव ने इस नगरी का नाम विनीता रखा। यहाँ और पाँच तीर्थंकरों ने दीक्षा ग्रहण की। आवश्यनियुक्ति के अनुसार यहाँ दो तीर्थंकर ऋषभदेव ( प्रथम ) अभिनन्दन (चतुर्थ) ने जन्म ग्रहण किया ।" अन्य ग्रन्थों के अनुसार ऋषभदेव, अजितनाथ, अभिनन्दन, सुमति, अनन्त और अचलभानु की जन्मस्थली और दीक्षास्थली रही है । राम, लक्ष्मण आदि बलदेव - वासुदेवों की भी जन्मभूमि रही है। अचल गणधर ने भी यहाँ जन्म ग्रहण किया था । आवश्यकमलयगिरिवृत्ति" के अनुसार अयोध्या के निवासियों ने विविध कलाओं में कुशलता प्राप्त की थी इसलिये अयोध्या को 'कौशला' भी कहते हैं। अयोध्या में जन्म लेने के कारण भगवान ऋषभदेव कौशलीय कहलाये थे T भरत चक्रवर्ती सम्राट् भरत चक्रवर्ती का जन्म विनीता नगरी में ही हुआ था । वे भगवान ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनकी बाह्य आकृति जितनी मनमोहक थी, उतना ही उनका आन्तरिक जीवन भी चित्ताकर्षक था। स्वभाव से वे करुणाशील थे, मर्यादाओं के पालक थे, प्रजावत्सल थे। राज्य - ऋद्धि का उपभोग करते हुए भी वे पुण्डरीक कमल की तरह निर्लेप थे । वे गन्धहस्ती की तरह थे। विरोधी राजारूपी हाथी एक क्षण भी उनके सामने टिक नहीं पाते थे। जो व्यक्ति मर्यादाओं का अतिक्रमण करता उसके लिये वे काल के सदृश थे । उनके राज्य में दुर्भिक्ष और महामारी का अभाव था। एक दिन सम्राट अपने राजदरबार में बैठा हुआ था । उस समय आयुधशाला के अधिकारी ने आकर सूचना दी कि आयुधशाला में चक्ररत्न Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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