Book Title: Jain Siddhant Bhavan Granthavali Part 02
Author(s): Rushabhchand Jain
Publisher: Jain Siddhant Bhavan Aara
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३०९
Catalogue of Sanskrit, Prakrit, A bhramsa & Hindi Manuscript
( Paja-Patha-Vidhāna )
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ए योग जिणेसर पपिय सुरासुर, विहरमाण मय मणिमा ।
म भणावद भर मणमा , ते पाप गिय परमपय ॥
ति योग बहरमाण की गवा षण्मान ममाप्तम् । २०१८. विद्यमान व मनीर्थ कर पूजा विधान यदो श्री जिमयोगको दि इमान मुखपान । दीप राई क्षेत्र में भी विदेह शुभ धान ॥१॥ सम्बवसर विक्रम विगत पगु अमग्रहगाम कर । ज्येप्ट गुन्न प्रनिपद सुति। पन्न भयो छन्द ।। इति श्री सीमन्धरादि वीम गोदर पा रमाप्तम् । शुभमस्तु । शिया शिविरचन्द पद कम ग्यारह (एकादशी) वार पुरको शुभ बेला पूर्ण करी। गो जयवन्त प्रयौ । २०१६. विद्यमान बीस तीर्थ कर-पूजा श्रीमजबूधातफीपूष्कग सोपेषाय विदेहा शर स्यु । वेदा वेदा विद्यमानामिनेद्रा प्रत्येक धास्तेषु नित्य यामि ॥१॥ एते विशति तीर्थपा अपहरा, कारिविध्यसका, ससाराणंच तारणकचतुरा इद्रादिदेवीस्थिा। अतातितगुणाकरा मुघकरा मोहाध फारापहा, मुरित श्रीललनाविलास ललिता रक्षत पो भाक्तिकान् ॥१२॥ इति विशतिविद्यमान तीर्थकर पूजा समाप्ता। २०२० व्रत-विधान चौदाशि ग्यारस ११ आव ८ तीन ३ चौथ ४ एव उपवाम ४५ भावनापचीसी व्रत दसें १० पून्यो १५ एव उपवास २५ भावना वत्तीसी व्रत । आश्विनन्या पूर्वमुपवास एक पूर्ण सप्तविंशति, नक्षत्रते द्वितीयमुपवाश्वन्या क्रियते ।। इति व्रत विधानम् ।
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