Book Title: Jain_Satyaprakash 1946 09
Author(s): Jaindharm Satyaprakash Samiti - Ahmedabad
Publisher: Jaindharm Satyaprakash Samiti Ahmedabad
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४ १२ નિર્માન્ત તવાલેક
३२१ स्वतंत्रताधिकारी की भी जन्मदात्री होने से मातृभूमि से बडी अधिक रूपेण पूजनीया माता अवश्य है। इसी तरह स्वर्ग से भी अधिक सुखदेनेवाली होने के नाते या जन्म देनेके कारण स्वर्गसे भी अधिक बड़ी पूजनीया माता है यह सुतरां सिद्ध है।।
इसी तरह गुरु भी परम उपास्य देव है, गुरुका अर्थ है अज्ञानरूपी अंधकारनाशक ज्ञानरूपी प्रकाशदायक । वास्त वमें सांसारिक महादुःखसे छुटकारेका मार्ग बतलानेवाले सच्चे गुरु ही हैं। विना गुरुकी कृपासे अज्ञान दूर नहीं होता। गुरु सच्चे सेवाके पवित्र स्थान हैं। सारांश यह निकला कि माता, पिता, गुरु, साधुजनों की सेवा अवश्य करने योग्य है। मगर
धर्म विश्वानि मन्यन्ते यं तमेव सुदुधियः ।। पापानि खलु मन्यन्ते तेषां वदग्ध्यमीक्ष्यताम् ॥ दुर्वाधहतबुद्धीनां मुक्तीनां खण्डनेऽपि हा ।। भाताह त्रपा चित्ते किं कुर्यो विवशस्ततः ॥ पिज्योः सेवाऽपि पुत्रस्य भवबन्धनकारिणी ।
यत्र तत्र कथङ्कारं भवेद्धर्मविवेचना ॥
दुनिया जिस बातको धर्म मानती है, बहुतसे मूढ लोग उसो धार्मिक बातको पाप मानते हैं । इनकी पण्डिताई को बुद्धिमान् लोगोंको छोड देनी चाहिये । वस्तुतत्त्व के देखने में असमर्थ-बुद्धिबालोंकी उक्तियों के खण्डन करनेमें भी विद्वानों के हृदय में कभी कभी लज्जा हो जाती है, क्योंकि उनका अपलाप ही बुद्धिहोन मदोन्मत्त के जैसा रहता है। लेकिन क्या किया जाय ? धर्म की स्वरूप रक्षा के लिये, भगवान् वीतराग की आज्ञा के संस्थापन के लिये, विवश होकर कुछ जैसा तैसा भी कहना पड़ता है । जिसके सैद्धान्तिक बिचार में मातापिता की सेवा भी भवबन्धन करनेवाली है अर्थात् पाप है, उसमें धर्म की विवेचना किस प्रकार की जाय, मातापिताकी सेवाको पाप बतानेवाले विवेकहीन हैं-उत्सूत्रभाषी हैं।
भिक्खुजी के ही समान भ्रमविध्वंसनकार श्रीजीतमलजीने भी मातापिताकी सेवामें अनर्गल ही प्रलाप किया है। क्यों न करें ? या वैसा लिखना उनको योग्य ही है, क्योंकि दुनियामें 'पुत्रः पित्र्यनुरूपकः' या " यथागुरुस्तथा शिष्यः" यह परम्परासे प्रसिद्ध है, अतः जीतमलजोको भी मातापिताकी सेवाको पाप बतलाना कोई उतना विशेष नहीं। आप महाशयने अपने 'भ्रमविध्वंसन' के पृष्ठ ४७ और ४८ पर मातापिताकी सेवाको पाप सिद्ध करने के लिये यथाशक्ति अपनी बुद्धि का पूर्ण परिचय दिया है, यहां तक कि अपने कपोलकल्पित मतकी स्थापना के लिये और भिक्खुजीकी अनुकम्पाटालकी स्थापना के लिये ' उववाई सूत्र ' के अर्थका भी अनर्थ कर दिया है । अब हम ‘उवाई सूत्र' के उस पाठको पाठकोंके सामने उपस्थित करते हैं, जिसके वास्तविक अभिप्रायको नहीं समझकर इनकी ऐसी विरुद्ध प्ररूपणा है, वह पाठ यह ह कि
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