Book Title: Jain_Satyaprakash 1946 09
Author(s): Jaindharm Satyaprakash Samiti - Ahmedabad
Publisher: Jaindharm Satyaprakash Samiti Ahmedabad
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३२४ ] શ્રી જૈન સત્યપ્રકાશ
[वर्ष ११ निर्देश क्यों किया ? और न स्थानाङ्ग सूत्र के स्थान ५ को ही देखनेके लिये आपने कष्ट किया। सूत्रपाठ यह है:- " धम्मं चरमाणस्स पंचणिस्ता ठाणा पण्णत्ता तंजहा-छकाये, गणे, राया, गिहपती शरारं ।" --[ स्थानाङ्ग स्नान ५ ]
___ अर्थात् श्रत और चारित्र पालन करनेवाले व्यक्ति के ५ पांच सहायक होते हैं, जैसेछः काया, गण, राजा, गृहपति और शरीर ।
वास्तव में विना ग्रामधर्म के, विना नगरधर्म के, विना राष्ट्रधर्म के और विना संघधर्म के श्रुत चारित्र धम का पालन अत्यन्त कठिन और असंभव-सा है और यह बात एकदम प्रत्यक्ष है, जैसे, मान लिजिए कि कोई सच्चा साधु है वह अपने श्रुत चारित्र का पालन करता है, सच्चे धम का उपदेश करता है और जब वह संयोग वश ऐसे स्थानमें आ जाय जहां का ग्रामधर्म ठीक न हो, या राष्ट्रधर्म ठीक न हो या नगरधर्म अच्छा न हो अर्थात् साधु के धर्म के प्रतिकूल प्रामादि धर्म हो तो वहां किसी तरह भी श्रुत चारित्र का पालन कठिन है। इस तरह कोई नामधारी साधु है मगर श्रुत चारित्र से कोसों दूर है और वहांका ग्रामधर्म, राष्ट्रधर्म अच्छा है तो वहां अवश्य साधु की खबर ली जा सकती है और चाहें तो साधु अच्छे बन सकते हैं वा उन्हें उचित दण्ड मिल सकता है। अतः श्रत चारित्र के अलावा आठो धर्मों को पाप कहना अविवेकता का परिणाम है । धर्म ही की तरह दश विध स्थावरों की भी इन्होंने विरुद्ध प्ररूपणा की है। वास्तव में ये धर्म और थेरे (स्थविर) के जैसे नाम है वैसे गुण हैं। पाप ही पाप कहलाता है मगर जिसमें धर्म है वह पाप नहीं है अर्थात् धर्म है। मातापिता की सेवा धर्म है। ग्रामादि धर्म माक्ष में सहायक होने से धर्म है, धर्म की व्याख्या यह है
धर्मः शर्मलदास्पदं विनयते धर्म मुनिः संश्रितो धर्मेणाभिहताः सुदुष्कृतिथयाः धर्माय यत्नं कुरु । धर्मान्नास्ति परं शुभास्पदमलं धर्मस्य नित्यं जयो धमें सर्वमतिः सदा प्रभवतात् भो धर्म ! दिव्यं दिश ॥ ॥ ॐ शान्तिः ॥
(समाप्त) दो और 'फागु' काव्य
लेखक : श्री. अगरचंदजी नाइटा श्री जन सत्य प्रकाश के क्रमांक १२६, १२७ में फागु' काव्योंके सम्बना यो लेख प्रकाशित हुए हैं। जिस समय ये लेख प्रकाशित हुए थे, में सिलहटमें था भतः विशेष प्रकाश नद डाल सका। अब कुछ नवीन जानकारी दी जा रही है
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