Book Title: Jain Dharmma Nam Smaranni Avdharna
Author(s): Manharbala Kantilal Shah
Publisher: Antararashtriya Jain Vidya Adhyayan Kendra

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Page 134
________________ (૭) - લોગસ્સ સૂત્રનું કરાંજલિ દ્વારા ધ્યાન કરવાની રીત डॉ. दिव्यप्रभाजी के ही शब्दों में : "आओ हाथ की हथेलियों की भाग्यरेखा में भगवान रेखा के दर्शन करे । हमारा कर-संपुट अष्टमंगल है । हस्तांजलि परममंगल है । मानवीय हाथ में अद्धर्ध चन्द्ररेखा है । दोनों हाथों की अंजलि करो तो एक सुंदर दूज के चन्द्र की सी रेखा बन जाएगी । जहाँ हमारे परम मंगल स्वरुप महावीर स्वामी विराजमान है । वह सिद्धशीला इस चन्द्ररेखा जैसी आकृतिवाली है । सिद्धशिला के नीचे बिलकुल हथेली के मध्यभाग में हम साधक है । इस चन्द्ररेखा के ऊपर रही अंगुलियों में स्वाभाविक २४ रेखाएँ आप देख सकते हो । इन करांगुलियों की २४ रेखाओ में २४ भगवान की प्रतिष्ठा करो । रोज प्रथम २४ प्रभु के दर्शन कर सिद्धशीला में 'सिद्धा सिद्धि मम दिसंतु' के मंत्र द्वारा स्वयं के सिद्धत्व की प्रभु को भावांजलि करो लोगस्स सूत्र की प्रथम गाथा के चारों पाद से चारो दिशाएँ शुद्ध होलागी । भीतर प्रकट होगी भगवत्सता । दुसरी, तीसरी आर चौथी इन तीन गाथाओं की इन पौरवों में प्रतिष्ठा करो । नामों की स्थापना पौरवो में करते हुए गाथा पाँच का ध्यान दाहिने अंगूठे में और गाथा छह का ध्यान बायें अंगूठे में बोलकर के अंतिम गाथा को सिद्धशिला स्वरुप चन्द्ररेखा में बोलकर परम सत्ता को हथेली में स्थापित करने का और परमस्वरुप को हृदय में प्रकट करने का अद्भुत सामर्थ्य प्रकट होता है । दोनों हथेलियों को जोड़कर आँखों पर और मस्तक पर लगाकर बाद में ही आँखे खोलनी चाहिए और जगत की ओर देखना चाहिए । लोगस्स सूत्र विधि-प्रक्रिया और सफलता के कारण त्रैलोकय अवाधित है । यह स्वाध्याय का साक्षात स्वरुप है, परन्तु अस्वाध्याय वाला कालदोष इसमें नही लगता है । क्षेत्र से भी यह अबाधित है । द्रव्य से शुद्ध स्वरुप है । भाव से सिद्ध स्वरुप है ।

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