Book Title: Jain Dharma ke Sadhna Sutra
Author(s): Mahapragna Acharya
Publisher: Adarsh Sahitya Sangh
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है ? सत् का प्रवर्तन कितना होता है ? निवर्तन कितना होता है ? हम ऐसा पुरुषार्थ करें, जिससे असत् का निवर्तन कर सकें, इसके साथ साथ सत् का भी निवर्तन कर सकें । यदि हम असत् के निवर्तन और सत् के प्रवर्तन का ठीक मूल्यांकन कर पाएं तो जीवन-क्रम बदल जाए, जीवन की चर्या बदल जाए।
जीवन-चर्या का दर्शन
तपस्या की प्रक्रिया जीवन-चर्या का महत्त्वपूर्ण दर्शन है । भोजन, चलनाफिरना, उठना-बैठना आदि हमारे जीवन की अनिवार्यता है । इन्द्रियों से काम लेना भी अनिवार्यता है | हमारे जीवन की ये तीन मुख्य प्रवृत्तियां बनी हुई हैं- आहार, गति-क्रिया और इन्द्रिय-प्रवृत्ति । इन तीनों का निवर्तन करना या इन तीनों का सम्यक् प्रर्वतन करना तपस्या का पहला पाठ है । आहार के द्वारा एक व्यक्ति अहिंसा की दिशा में भी जा सकता है, हिंसा और अपराध की दिशा में भी जा सकता है । आधुनिक वैज्ञानिक खोजों से यह प्रमाणित हो गया है कि आहार का ठीक विवेक न हो तो वह व्यक्ति को हिंसक भी बना देता है और यदि आहार का ठीक विवेक हो तो वह अहिंसा की भावना को भी जन्म दे देता है । ऐसा ही इन्द्रियों के साथ घटित होता है । वे हमें स्वस्थ भी बना देती हैं, रुग्ण भी बना देती हैं । हम सम्यक् प्रवर्तन या निवर्तन करना सीखें । आंख से काम लेना है तो आंख को मूंदकर काम लेना भी जरूरी है । कान से सुनना है तो उसे बंद करके सुनना भी जरूरी है ।
साधक तत्त्व
प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्त्य, स्वाध्याय, ध्यान, व्युत्सर्ग आदि तपस्या के सारे प्रकार उदात्त जीवन जीने के लिए आवश्यक हैं। ये सब शोधन और निरोध के साधन हैं । यदि हम इनके प्रति जागरूक बन जाएं तो जीवन की सारी धुरी ठीक घूमने लग जाती है । जागरूकता का साधन है- ध्यान और एकाग्रता ।
नव तत्त्वों में संवर और निर्जरा- ये दोनों तत्त्व साधना की दृष्टि से
मनोवृत्ति को बदला जा सकता है
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