Book Title: Jain Dharm evam Bhakti Author(s): Deshbhushan Aacharya Publisher: Z_Deshbhushanji_Maharaj_Abhinandan_Granth_012045.pdf View full book textPage 8
________________ इसी तरह अर्हन्त भगवान् की प्रतिमा वास्तव में अजीव जड़ पदार्थ होते हुए भी अपने दर्शक के हृदय पर अपनी शान्ति ब.वीतरागता की छाप लगा ही देती है। अर्हन्त भगवान् के दर्शन, पूजा, भक्ति से शान्ति व वैराग्य प्राप्त होता है । आत्मा को आनन्द और तृप्ति इसी से मिला करती है । इसके साथ अतिशय पुण्य कर्म का समागम भी होता है जिससे कि स्वर्ग राज्य आदि सांसारिक विभूति स्वयं मिल जाती है। इस कारण अर्हन्त भगवान् की भक्ति करके किसी सांसारिक वस्तु की इच्छा नहीं करनी चाहिये । __ अर्हन्त भगवान् की भक्ति से तो अनन्त अविनाशी मुक्ति पाने का उद्देश्य रखना चाहिये । संसार-सुख तो अपने आप मिल ही जाता है। इस तरह अर्हन्त की प्रतिमा को साक्षात् अर्हन्त भगवान् मान कर बड़े उत्साह के साथ सदा दर्शन, पूजन, भक्ति करनी चाहिये तथा उनका ध्यान करना चाहिये । यह अर्हन्त-भक्ति है । श्री ऋषभनाथ भगवान् सबसे पहले अर्हन्त भगवान् हुए हैं । उन्होंने ही कैवल्य प्राप्त करके अर्हन्त अवस्था में सबसे प्रथम संसार के प्राणियों को मुक्ति-मार्ग का उपदेश दिया था । वैष्णव सम्प्रदाय में ईश्वर के २४ अवतार माने गये हैं। उनमें से भगवान् ऋषभनाथ को छठे अवतार के रूप में माना गया है। भागवत पुराण में भगवान् ऋषभनाथ का वृत्तान्त जैन ग्रन्थों से मिलता-जुलता लिखा हुआ है। वैष्णव सम्प्रदाय में एक बाल ब्रह्मचारी, परम तपस्वी, नग्न दिगम्बर 'शुकदेव जी' नामक साधु हुए हैं। उन्होंने ईश्वर के २४ अवतारों में से केवल 'ऋषभ अवतार' को नमस्कार किया है। जब लोगों ने श्री शुकदेव जी से इसका कारण पूछा कि आप अन्य अवतारों को नमस्कार क्यों नहीं करते ? तब उन्होंने बड़ी गम्भीरता के साथ उत्तर दिया कि 'अन्य अवतारों ने संसार का मार्ग चलाया है, ऋषभदेव जी ने मुक्ति का मार्ग चलाया है। इसलिये मुक्ति की इच्छा से, . मैं ऋषभदेव जी को ही नमस्कार करता हूं।' जो स्त्री-पुरुष संसार-सागर से पार होना चाहते हैं, कर्मबंधन काट कर सदा के लिये पूर्ण स्वतन्त्र होना चाहते हैं, उनको संसार-सागर से पारगामी, घाती कर्मबन्धन से मुक्त, मुक्ति-मार्ग के प्रदर्शक, परमशुद्ध, बुद्ध, निरञ्जन, निर्विकार, सच्चिदानन्द अर्हन्त परमात्मा का श्रद्धालु भक्त बनना चाहिये । इस कारण अर्हन्त भगवान् की भक्ति क्रमशः भक्त को एक दिन भगवान् बनाने का सुगम साधन है। उसके द्वारा तीर्थकरबंध बँध जावे, इसमें तो आचर्य ही क्या है ? आचार्य-भक्ति साधु-संघ के अधिनायक आचार्य कहलाते हैं । वे गुरुओं में मुख्य होते हैं । उनकी भक्ति करना 'आचार्य भक्ति' है। 'आचार्य' एक पद है जो कि मुनि-संघ के सबसे अधिक तपस्वी, अनुभवी, देश, क्षेत्र, काल, भाव के ज्ञाता, पांच आचारों के पालक, प्रायश्चित्त शास्त्र के जानकार महान् मुनि को समस्त मुनियों की अनुमति से प्रदान किया जाता है । संघ के समस्त मुनि आचार्य की आज्ञानुसार चर्या करते हैं। नवीन मुनि-दीक्षा आचार्य ही देते हैं । मुनि जन आचार्य महाराज के समक्ष अपने दोर्षों की आलोचना करते हैं और उनको उनकी शक्ति-अनुसार प्रायश्चित्त भी आचार्य ही देते हैं । संघ में यदि कोई साधु बीमार हो जाय तो उसकी वैयावृत्त्य (सेवा) का प्रबन्ध भी आचार्य ही करते हैं । द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव का अनुमान करके आचार्य ही अपने मुनि-संघ को किसी स्थान पर ठहरने और कितने समय ठहरने तथा वहां से कब और किस ओर विहार करना है—यह आदेश देते हैं। यदि किसी स्थान पर संघ के ऊपर आता हआ कोई भीषण उपद्रव देखते हैं तो उस समय मुनि-संघ में उस उपद्रव के समय समस्त मुनियों का कर्तव्य-निर्धारण भी आचार्य ही करते हैं तथा किसी मुनि को संघ से निकालना, किसी को अपने संघ में सम्मिलित करना भी आचार्य के ही अधिकार की बात है। यदि कोई मुनि समाधिमरण ग्रहण करना चाहे तो आचार्य महाराज ही उसकी शारीरिक योग्यता, उसकी परिषह-सहन करने की क्षमता तथा उसके स्वास्थ्य आदि बातों का विचार करके उसको समाधिमरण की अनुमति देते हैं। आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज अभिनन्दन प्रत्य २२ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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