Book Title: Jain Darshan me Vyavahar ke Prerak Tattva
Author(s): Pramuditashreeji
Publisher: Prachya Vidyapith Shajapur

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Page 18
________________ 12 जैनदर्शन में व्यवहार के प्रेरकतत्व उनके व्यवहार को ही प्रेरित करती है, जबकि मानव जैसे विकसित प्राणी में वह एक चिन्तन मूलक मानसिक-संचेतना रूप होती है और यहीं विवेक का तत्त्व उसके व्यवहार के साथ जुड़ता जाता है । यद्यपि सभी देहधारी या संसारी प्राणी इन जैविकवृत्तियों से युक्त होते हैं, किन्तु उनमें मनुष्य ही एक ऐसा है, जो उनके प्रति सजग होकर विवेकपूर्ण निर्णय लेने की ओर तदनुरूप व्यवहार करने की क्षमता रखता है। यही धर्म का तत्त्व भी उसके जीवन में जुड़ता है, जो उसकी विशिष्टता बन जाता है। यही विवेक का तत्त्व ही उससे नैतिक एवं धार्मिक सदाचरण की अपेक्षा रखता है। सामान्य रूप से धर्म और नैतिकता ही ऐसे दो अभिन्न तत्त्व हैं, जो मानवीय-व्यवहार को परिमार्जित और परिष्कारित करते हैं। जैन-धर्म में संज्ञा की जो अवधारणा है, वह एक ओर प्राणीय व्यवहार के जैविक एवं मनोवैज्ञानिक प्रेरक तत्त्वों की व्याख्या करती है, वहीं दूसरी ओर, धर्म या नैतिकता पर बल देकर व्यक्ति के व्यवहार को परिष्कारित एवं परिमार्जित भी करती है। संज्ञाएं एक ओर यह बताती है कि किन-किन परिस्थितियों में प्राणी किस प्रकार का व्यवहार करेगा। दूसरे शब्दों में, वे व्यवहार का जैविक एवं मनोवैज्ञानिक आधार पर विश्लेषण करती हैं, किन्तु साथ ही यह भी सिखाती हैं कि एक विवेकशील एवं धार्मिक प्राणी होने के नाते मनुष्य को किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए? वे व्यवहार के क्षेत्र में यथार्थ और आदर्श के बीच एक सेतु बनाती है और वासना और विवेक के दोराहे पर खड़े मनुष्य को व्यवहार की सम्यक दिशा प्रदान करती है। वासनाओं की पूर्ति एक तथ्य है और धार्मिक होना एक आदर्श है। मनुष्य के लिए यह आवश्यक है कि यथार्थ से आदर्श की और गतिशील हो। मैं साध्वी प्रमुदिताश्रीजी को उनके बाल्यकाल से ही जानता हूँ। मेरे पारिवारिक-परिवेश में रहकर ही उनका विकास हुआ है। भावुकता और विवेकशीलता-दोनों ही गुण उनमें हैं, वे यथार्थ और आदर्श के समन्वय की साकार प्रतिमा हैं । पूज्य विनोदश्रीजी एवं पूज्य हेमप्रभाश्रीजी (दोनों ही आपकी संसारपक्षीय बुआएँ रही हैं) का मधुर स्नेहासिक्त दुलार और लौकिक-शिक्षण से प्राप्त विवेकशक्ति-दोनों के समन्वय से ही आप युवावस्था के प्रथम चरण में ही संन्यास जैसा कठोर निर्णय लेने में समर्थ हुई हैं। विरोधी ध्रुवों के मध्य समन्वय साधने की आपमें अद्भुत कला है, अतः मैंने और पूज्या हेमप्रभाश्रीजी ने विचारपूर्वक ही आपको शोध के लिए 'संज्ञा' का विषय सुझाया था। उनके जीवन में विषय-चयन और लेखन-कार्य करने के बीच अनेक अप्रत्याशित बाधाएँ आई, संन्यस्त जीवन का प्रारम्भ पूज्या हेमप्रभाश्रीजी का Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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