Book Title: Jain Darshan ka Manovigyan Man aur Leshya ke Sandharbh me Author(s): Rajiv Prachandiya Publisher: Z_Nahta_Bandhu_Abhinandan_Granth_012007.pdf View full book textPage 1
________________ HOJ3005000000000 DOB30040300-00-NAME DOOD अध्यात्म साधना के शास्वत स्वर ५३१ । जैन दर्शन का मनोविज्ञान : मन और लेश्या के सन्दर्भ में TODD _-डॉक्टर राजीव प्रचंडिया, एडवोकेट (एम. ए. (संस्कृत), बी-एस. सी., एल-एल. वी., पी-एच. डी. ) जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहाँ मनोविज्ञान की आज है। इसके अमूर्तिक अर्थात् वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्श आदि मूर्ति का अपेक्षा न हो। इसका मूल कारण है कि विकार-तनाव अर्थात् । अभाव होने के कारण साक्षात् दर्शन-उपलब्धि हेतु जीव को त्रासमय प्राणी का मन अस्थिर-अस्पष्ट होने के फलस्वरूप वह 'इन्द्रियों' का अवलम्बन अपेक्षित रहता है। वास्तव में इन्द्रियाँ अनेक आपदाओं-विपदाओं से ग्रसित-व्यथित है, अस्तु उसके जीवन आत्मा के अस्तित्त्व की परिचायक हैं तथा आत्मा के द्वारा होने की प्रत्येक क्रिया-प्रक्रिया और प्रतिक्रिया में असन्तोष और भय वाले संवेदन का साधन भी। इन्द्रियाँ पाँच भागों में विभक्त हैंपरिलक्षित है, आवेग-आक्रोश समाविष्ट है। मन के विज्ञान-तन्त्र पर १. श्रोत्र इन्द्रिय २. चक्षु इन्द्रिय जब मनन-चिन्तन किया जाता है तो अनगिनत समस्याओं से सम्पृक्त वही व्यक्ति निश्चय ही अपने को इन समस्याओं से अलग-थलग ३. घ्राण इन्द्रिय ४. रसना इन्द्रिय पाता है। वास्तव में जो विज्ञान अर्थात् विशिष्ट ज्ञान आदर्शवादिता ५. स्पर्शन इन्द्रिया से परे यथार्थता से अनुप्राणित जीव के चेतन अथवा अचेतन मन ये पाँचों इन्द्रयाँ दो-दो प्रकार की होती हैंके समस्त व्यवहारों-क्रियाओं का सम्यक् अध्ययन- विश्लेषण अर्थात् उसके रूप-स्वरूप का उद्घाटन करने में सक्षम हो वही वस्तुतः १. द्रव्येन्द्रिय २. भावेन्द्रिय मनोविज्ञान है। जैनमनोविज्ञान किसी प्रयोगशालायी निकष पर नहीं इन्द्रियों की आंगिक संरचना अर्थात् इन्द्रियों का बाह्य अपितु आगम-मनीषियों/ध्यान-योगियों की सूक्ष्म अन्तर्दृष्टि पर । पौद्गलिक रूप द्रव्येन्द्रिय तथा आन्तरिक क्रियाशक्ति अर्थात् अवस्थित है। आन्तरिक चिन्मय रूप भावेन्द्रिय कहलाती है। जैनाचार्यों ने इनके प्रस्तुत आलेख में 'जैन दर्शन का मनोविज्ञान : मन और लेश्या । पुनः भेद-प्रभेद किए हैं। द्रव्येन्द्रिय 'निवृत्ति' और 'उपकरण' तथा के सन्दर्भ में' नामक सामयिक एवं परम उपयोगी-व्यापक विषय पर भावेन्द्रिय लब्धि और उपयोग दो भागों में प्रभेदित हैं। उपर्युक्त संक्षिप्त चर्चा करना हमारा मूलाभिप्रेत है। पाँच इन्द्रियों में से चार इन्द्रियाँ अर्थात् श्रोत्र, घ्राण, रसना और दृष्ट और अदृष्ट इन द्वय क्रियाओं में व्यक्ति का जीवन स्पर्शन प्राप्यकारी तथा चक्षु इन्द्रिय अप्राप्यकारी होती हैं। इसका संचरण होता है। दृष्ट क्रियाओं का सीधा सम्बन्ध मन की चैतन्य मूल कारण है कि ये चारों इन्द्रियाँ बाह्य पदार्थों के अर्थात् अवस्था से रहा करता है जबकि अदृष्ट क्रियाएँ मन की अचेतन अपने-अपने विषय के संसर्ग से उत्तेजित होकर अपने ग्राह्य विषय अवस्था के परिणामस्वरूप हैं। मनुष्य की ये समस्त क्रियाएँ उसकी को ग्रहण करती हैं किन्तु चक्षु इन्द्रिय संसर्ग की अपेक्षा प्रकाश एवं मनोवृत्तियाँ कहलाती हैं। जैनदर्शन में मनोवृत्ति के मुख्यतः तीन रूप रंगादि के माध्यम से ही संवेदन करती है। इन्द्रियों के भेद-प्रभेदों के बताए गए हैं उपरान्त यह जानना भी आवश्यक हो जाता है कि इन इन्द्रियों के क्या-क्या विषय-व्यापार हैं ? श्रोत्रेन्द्रिय का विषय 'शब्द' है।६ शब्द १. ज्ञान २. वेदना ३. क्रिया। तीन प्रकार के हैंइन तीनों का ही एक दूसरे से शाश्वत तथा प्रगाढ़ सम्बन्ध है क्योंकि जो कुछ ज्ञान जीव को होता है, उसके साथ-साथ वेदना १. जीव का शब्द २. अजीव का शब्द और क्रियात्मक भाव भी स्थिर होने लगते हैं। प्रत्यक्षीकरण, संवेदन, ३. मिश्र शब्द। स्मरण, कल्पना और विचार संवेदन नामक मनोवृत्तियाँ ज्ञान रूपी कुछ विचारक शब्द के सात प्रकार मानते हैं। वास्तव में शब्द मनोवृत्ति, सन्देश उत्साह स्थायी भाव और भावना नामक | एक प्रकार के पुद्गल परमाणुओं का कार्य है जिसके परमाणु मनोवृत्तियाँ, वेदना तथा सहज क्रिया, मूलवृत्ति, स्वभाव, इच्छित | सम्पूर्ण लोक में सदा व्याप्त रहते हैं। चक्षु इन्द्रिय का विषय क्रिया, चारित्र नामक मनोवृत्तियाँ, क्रिया मनोवृत्ति के अन्तर्गत आती । रंग-रूप है। मुख्यतः पाँच प्रकार के रंग होते हैं-काला-नीला-पीलाहैं। इन त्रय मनोवृत्तियों के पल्लवन-विकसन से प्राणी का अन्तर्मन लाल-श्वेत। इन पाँचों के सम्मिश्रण से अन्य शेष रंग प्रकट होते हैं। प्रबल होता है और संकल्प शक्ति स्थिर रहती है। तृतीय इन्द्रिय है घ्राणेन्द्रिय, जिसका व्यापार नासिका द्वारा गन्ध जैनदर्शन अध्यात्म अर्थात् आत्मवादी दर्शन है। यहाँ आत्मा के | प्राप्त कराना है। गन्ध दो प्रकार की होती हैं- सुगन्ध और दुर्गन्ध। अस्तित्व, उसके स्वरूप-अवस्थादि पर गहराई के साथ चिन्तन किया । रसनेन्द्रिय का विषय है रसास्वादन। अम्ल, लवण, कषैला, कटु, गया है। जैनदर्शन में आत्मा को अनन्त ज्ञान-दर्शन मय माना गया । और तीक्ष्ण ये पाँच प्रकार के रस होते हैं। स्पर्शानुभूति में स्पर्शन SRO 03%D 000 . D O Sonace 100.000000 SADNA SEOPage Navigation
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