Book Title: Dharmshiksha
Author(s): Nyayavijay
Publisher: Gulabchand Lallubhai Shah

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Page 179
________________ धर्मशिक्षा. इन चारों प्रकारका अनर्थदंड धर्मात्मा श्रावकोंको वर्जना चाहिए । जहाँ तक मनकी पवित्रता न हुई, वहां तक धर्म-राजेका प्रवेश मनोभवनमें नहीं हो सकता, इस लिये मनमें आध्यान रौद्रध्यान को पैठा कर पापका पोषण नहीं करना चाहिए । हमेशा अच्छे अच्छे विचारोमें रमना मनुष्यमात्रका फर्ज है। किसीपर बुरा विचार करना, यह सचमुच मनुष्यत्वकी गद्दीसे नीचे उतर जाना है । वास्तवमें कहा जाय तो संसारमें कोई किसीका दुश्मन नहीं है, तो फिर किस पर ईर्ष्या विरोध द्वेष क्रोध करना चाहिए, और अपनी आत्मामें तामसिक प्रकृतिका पाँव ठहराना चाहिए? । ब जरिए पुरातन कर्मके लोग शत्रु मित्र होते है । जैसी अपनी प्रवृत्ति होती है, वैसा असर दूसरेपर पडता है, इस लिये कहनेका मतलब यह है कि प्रेम या द्वेषको जन्म देना अपने ताल्लुक है । जब यही बात है, तो अपने दिलको एकदम उद्धत नहीं बनाके सत्त्व प्रकृतिसे रौनकमंद बनाना चाहिए । गम खाना यह अक्लका पहिला प्रतिफल है । जो शख्स गम खानेका व्यसनी है, उसे आफतोंका वेग उठाना नहीं पडता । हरएक प्रतिकूल कामके प्रसंगपर गम खा के हृदयको समझाना चाहिए कि द्वेषरुपी अन्धकारसे अन्धा न बने । सब काम निश्चय नयसे जब कर्मके ताल्लुक हैं, तो फिर धनकी पैदायशके लिये मानसिक स्थिति कोचिंतारूपी धूवेसे क्यों मलिन करना?। शुद्ध दिलसे अपनी जिन्दगी का विचार करो! और नीतिपूर्वक व्यापार द्वारा धन पैदा करो, मगर अत्यंत मोहदशामें क्यों फँसो ! । मृढ बनके आर्तध्यान करनेसे कोई कार्यकी सिद्धि नहीं होती, कार्यकी सिद्धि उद्यमपर निर्भर है, तो विवेक पूर्वक--सचप्रकृतिको आगे धरकर ऐसा उचित चिंतन करो कि आत्मामें । तिमिरका जोर बढने न पावे, और धन पैदा करनेका रास्ता सूझ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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