Book Title: Danadikulaksangrah Author(s): Devendrasuri, Jinendrasuri Publisher: Harshpushpamrut Jain Granthmala View full book textPage 3
________________ -: प्रस्तावना :श्री अरिहन्त परमात्माओए भव्य जीवोने हितकारी धर्म उपदेश्यो छे, ते धर्म अनेक भङ्गथी बताव्यो छे. तेमां दान शील तप अने भाव एम चार प्रकारे पण धर्म बताब्यो छे. ते धर्मनु स्वरूप महापुरुषोए बताव्या मुजब दानकुलक शीलकुलक अने तपकुलक अने भावकुलक एम कुलकोनी रचना तपागच्छाधिराज श्रीदेवेन्द्रसूरीश्वरजी महाराजे करी छे, जे प्राकृत भाषामां सरल अने बोधप्रद छे अने कण्ठस्थ करवा योग्य छे. पूज्य देवेन्द्रसूरीश्वरजी महाराज महाविद्वान हता. अनेक महान ग्रन्थोनी रचना करी छे. श्री महावीर पट्टपरंपरामां महान पट्टधर युगप्रधान सदृश हता. आ दानादिकुलक उपर तपागच्छेश भट्टारक श्रीविजयरत्नसूरीश्वर राज्यमां पंडित वृद्धिकुशल गणिना शिष्य पंडित लाभकुशलगणिए टीका रची छे. जे सरल छ, साथे ते ते विषयने लगती कथाओ मकीने ते ते कुलकना भावो प्रगट कयों छे. संस्कृतना अभ्यासीओ सरलताथी आ ग्रन्थन वांचन करी शकशे. २०५१ जेठ बद ५ गोरेगांव-श्रीनगर जिनेन्द्रसूरिPage Navigation
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