Book Title: Bhaktamar Stotra Sarth
Author(s): Subodhvijay
Publisher: Mahesh Sundarlal Kapadia

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Page 247
________________ ||न सत्तेस्वयिविद्दिते दि॥ गीरस्वामितिस्फूरति 'तेऊ सिहष्ट मात्र चोरािवा पादः प्रजायमानैः॥ त्रात वस्त्रघनमस्त्र समस्त्रका पिङगता रिता निति। पूरे मह किरणः कुरुतेनैवापका करे बुद्धलजा तिविकात चिता रको निकलवितातएव । वामुदति इदेयेन यदुत्तरतः । य द्वाधृतिस्त्ररतियकलमे बनून | मंतर्गत स्पमरुतः स किलानुनादः ॥ !नान्तं वनभूषणभूत नाघ॥ गुणे लुविनवत्तमति शुक्तः॥ सुल्पात वेतितवतोननुतेन किंदा नृत्याश्रितं सः इह्नात्मसमंक ऐति ॥१॥ यस्मिन्दर प्रवेत यो पिहननावाः। सो पिघया रतिपतिं पि ૨૩૨

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