Book Title: Arhat Vachan 1999 10
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 77
________________ दिगम्बर जैन महासमिति एकता शंखनाद समारोह समस्त दिगम्बर जैन समाज की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था दि. जैन महासमिति के रजत जयन्ती वर्ष की स्मृति में आयोजित एकता शंखनाद समारोह संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के ससंघ सानिध्य में 30-31 अक्टूबर 1999 को दि. जैन अतिशय क्षेत्र गोम्मटगिरि इन्दौर में संपन्न हुआ। समारोह का उद्घाटन भारत सरकार के वित्त राज्यमंत्री माननीय श्री वी. धनंजय कुमार के कर कमलों से श्री महेन्द्र पाण्ड्या, अध्यक्ष फेडरेशन ऑफ जैन एसोसिऐशन इन नार्थ अमेरिका तथा कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्र कुमार जैन, अध्यक्ष दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर के विशेष आतिथ्य में संपन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता महासमिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री प्रदीप कुमार जैन कासलीवाल ने की तथा इस अवसर पर राष्ट्रीय महामंत्री श्री माणिकचन्द जैन पाटनी, अतिरिक्त महामंत्री श्री जगमोहन जैन, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री राजेन्द्र जैन ठोलिया - जयपुर, श्री जयनारायण जैन- मेरठ, श्री सुन्दरलाल जैन - नागपुर, श्री अशोक बड़जात्या - इन्दौर, मध्यांचल के अध्यक्ष एवं स्वागताध्यक्ष श्री हुकुमचंद जैन - इन्दौर, कार्यक्रम के प्रमुख संयोजक श्री हंसमुख जैन गाँधी - इन्दौर उपस्थित थे। सहस्त्राधिक धर्म बंधुओं की उपस्थिति में संहितासूरि पं. नाथूलालजी शास्त्री के मंगलाचरण से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। - क चन्दन क दिगम्बर जैन महासमिति रजत जयंति वर्ष - एकता शंखनाद समारोह समारोह के अन्तर्गत मुख्य अतिथि श्री वी. धनंजयकुमार सभा को सम्बोधित करते हुए उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी ने कहा कि 'विशाल समारोह के कार्यक्रमों के दौरान गायक, वादक एवं नर्तकों के बीच तालमेल ध्यान देने योग्य है उनके बीच स्थापित यह तालमेल ही दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है इसके अभाव में सारा कार्यक्रम ही फीका हो जाता है। आज हमारे देश में भी दि. जैन महासमिति, अखिल भारतीय दि. जैन परिषद एवं अखिल भारतीय दि. जैन महासभा नामक तीन अखिल भारतीय संस्थाएं विद्यमान है। मेरा सभी संस्थाओं के नीति निर्धारकों, पदाधिकारियों एवं कार्यकर्त्ताओं से भी कहना है कि वे जैन धर्म के अनेकांत के सिद्धांत को अपने आचरण में उतारें तथा भगवान ऋषभदेव से भगवान महावीर तक चली आ रही हमारी धार्मिक परंपरा एवं जैन धर्म के सर्वमान्य सिद्धांतों के अनुरूप कार्य कर समाज का अर्हत् वचन, अक्टूबर 99 75

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