Book Title: Arhat Vachan 1999 10
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 81
________________ उपाध्यायश्री को ससंघ नमन किया। उपाध्याश्री ने अपने मंगल आर्शीवाद में कहा कि सरस्वती के वरद पुत्रों, विद्वानों का सम्मान उनका नहीं बल्कि जिनवाणी का सम्मान है। साधुओं की सीमा होती है जबकि विद्वान यत्र-तत्र जाकर गौरवशाली, आध्यात्मिक व परमार्थिक योजना रखते हए ग्रंथों का अनुवाद, सम्पादन, सृजन, श्रुत की आराधना, जिनवाणी की सेवा कर सकते हैं। पुराने विद्वानों का जो इसके प्रति लगाव था उसकी वर्तमान में कमी है लेकिन फिर भी अनेकों विद्वान है जो शोध, खोज एवं सम्पादन जैसे दुरूह कार्यों में लगे हुए हैं। विद्वानों का सम्मान, पाण्डुलिपियों का प्रकाशन - वाचन, जिनवाणी का निरन्तर विकास व उन्नति हों, यह उनकी भावना रही है। विद्वानों के सम्मान से उनका रोम-रोम पुलकित हो जाता है। उन्होंने आचार्य शान्तिसागर छाणी महाराज व उनकी परम्परा के आचार्यों आदि की स्मृति में दिये गये पुरस्कार एवं सराक जाति के उत्थान में योगदान देने वालों को पुरस्कृत करने की योजना पर प्रकाश डालते हुए बतलाया कि इससे जहां श्रुत संवर्द्धन होगा, वहां सराक जाति के उत्थान में कार्य करने वाली समितियों को प्रेरणा व मार्गदर्शन भी प्राप्त होगा। चातुर्मास समिति, अजमेर के बन्धुओं ने सभी का आभार माना। इसी अवसर पर अ. भा. दि. जैन सराक ट्रस्ट की ओर से इसी वर्ष से प्रायोजित सराक पुरस्कार - 99 का समर्पण सराकोत्थान उपसमिति - गाजियाबाद को किया गया। इस पुरस्कार के अन्तर्गत सराक क्षेत्र में सराक बन्धुओं के उत्थान हेतु सर्वश्रेष्ठ सेवा कार्य करने अथवा सराकोत्थान हेतु जन जाग्रति उत्पन्न करने वाले व्यक्ति अथवा संस्था को प्रति वर्ष रु. 25,000 = 00 नगद, शाल, श्रीफल एवं प्रशस्ति से सम्मानित किया जायेगा। इस वर्ष प्राप्त 14 प्रविष्टियों का मूल्यांकन श्रुत संवर्द्धन पुरस्कार निर्णायक समिति द्वारा ही किया गया। आचार्य जिनसेन कृत आदिपुराण - राष्ट्रीय संगोष्ठी अलवर, 24 - 26 अक्टूबर 1999 युवामनीषी, परम पूज्य मुनि श्री सुधासागरजी महाराज के ससंघ सान्निध्य में आचार्य जिनसेन कृत आदिपुराण पर जैन भवन, अलवर में 24-26 अक्टूबर 1999 के मध्य एक त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। उद्घाटन एवं समापन सत्र सहित नौ सत्रों में सम्पन्न इस संगोष्ठी में लगभग 60 मूर्धन्य विद्वान सम्मिलित हुए। संगोष्ठी के 9 सत्रों की अध्यक्षता क्रमश: डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव (पटना), जैन विश्व भारती संस्थान - लाडनूं के पूर्व कुलपति प्रो. रामजीसिंह (भागलपुर), डॉ. लालचन्द जैन (वैशाली), डॉ. रमेशचन्द जैन (बिजनौर), डॉ. वृषभप्रसाद जैन (लखनऊ), डॉ. (श्रीमती) राजमती दिवाकर (सागर), डॉ. शीतलचन्द जैन (जयपुर), डॉ. कृष्णकांत शर्मा (वाराणसी) एवं डॉ. जयकुमार जैन (मुजफ्फरनगर) ने की। संगोष्ठी का उद्घाटन श्री नरेन्द्र पाटनी, डी.आई.जी.- अलवर - भरतपुर रेंज द्वारा दीप प्रज्जवलन से सम्पन्न हुआ। पूज्य मुनि श्री ने अपने मांगलिक उद्बोधन में समस्त जैन विद्वानों का एकमत होकर जैन साहित्य, संस्कृति के राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रचार करने हेतु आह्वान किया। आपने तार्किक ढंग से सिद्ध किया कि जैन जीवन पद्धति एवं सिद्धान्त आज भी समसामयिक एवं प्रासंगिक हैं। संगोष्ठी के मध्य अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन विद्वत् परिषद के अध्यक्ष डॉ. रमेशचन्द जैन (बिजनौर) को महाकवि आचार्य मानसागर पुरस्कार से तथा डॉ. उदयचन्द जैन (उदयपुर), डॉ. जयकुमार जैन (मुजफ्फरनगर), डॉ. फूलचन्द्र प्रेमी (वाराणसी) का भी विशेष सम्मान किया गया। - डॉ. फूलचन्द जैन 'प्रेमी' संगोष्ठी संयोजक अर्हत् वचन, अक्टूबर 99

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