Book Title: Apbhramsa Bharti 1995 07
Author(s): Kamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka, Gopichand Patni
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 17
________________ अपभ्रंश भारती 7 जिनदत्त सूरि (संवत् 1132 से 1210) की उल्लेखनीय कृतियाँ हैं। इनमें मानव जीवन, आत्मोद्धार, लौकिक-पारलौकिक शिक्षाओं, गुरु-प्रशंसा और कुटुम्ब संगठन आदि पर विशेष बल दिया गया है। संयम मंजरी' महेश्वर सूरि की रचना है, जिसमें संयम को जीवन के सर्वोत्तम साधन के रूप में चित्रित किया गया है। इसमें साहित्यिकता का अभाव परिलक्षित होता है। इस धारा के कवि परलोक की अपेक्षा 'लोक' पर विशेष बल देते हैं । नैतिकता, निर्लिप्तता, लोक और परिवार कल्याण आदि इनकी चिन्ता के प्रधान विषय हैं। जयदेव मुनि (संवत् 1054) की भावना संधि प्रकरण' और विनयचन्द्र मुनि की 'कल्याणकरासु' एवं 'चूनड़ी' आदि इसी धारा के अन्तर्गत परिगणनीय हैं। जैन अपभ्रंश साहित्य में प्रबन्ध काव्य पर्याप्त मात्रा में लिखे गये। महाकवि स्वयम्भू, पुष्पदन्त, पद्मकीर्ति, धवल, धनपाल, हरिषेण, वीरकवि, नयनन्दि, कनकामर, रयधू, आचार्य हेमचन्द्र, श्रीचन्द, देवसेनगणि, हरिभद्र, लक्खण, लक्खमदेव, जयमित्रहल और हरिदेव आदि इस धारा के महत्त्वपूर्ण ज्योतिर्मय नक्षत्र हैं। ___ महाकवि स्वयम्भू अपभ्रंश की अनामिका पर अधिष्ठित कालिदास हैं । अपभ्रंश में रामकाव्य के प्रथम प्रणेता होने के कारण हम इन्हें अपभ्रंश का वाल्मीकि भी कह सकते हैं । संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश के प्रकाण्ड पण्डित होने के साथ ही वे काव्य, व्याकरण अलंकार और छन्दशास्त्र के निष्णात विद्वान् थे। विक्रम की सातवीं-आठवीं शताब्दी में इनका जन्म कर्नाटक में हुआ था। इनके पिता का नाम मारुतदेव और माता का नाम पद्मिनी था। 'पउमचरिउ', 'रिट्ठणेमिचरिउ' और 'स्वयम्भूछन्द' स्वयम्भू की सुख्यात कृतियाँ हैं। 'पउमचरिउ' रामकथा पर आधारित है और इसमें पाँच काण्ड हैं । गुरु-वन्दना से कथा आरम्भ होती है, इसके सभी पात्र जिनभक्त हैं । कथा के अन्त में राम निर्वाण प्राप्त करते हैं और मुनीन्द्र उपदेश देते हुए कहते हैं कि राग से दूर रहकर ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। _ 'रिट्ठणेमिचरिउ' का सम्बन्ध हरिवंश तथा महाभारत की कथा से है। इसमें जैनों के बाइसवें तीर्थंकर नेमिनाथ, श्रीकृष्ण एवं पाण्डवों का चित्रण किया गया है। स्वयम्भूछन्द' छन्दशास्त्र का ग्रन्थ है। इसे अगर हम अपभ्रंश का 'अष्टाध्यायी' कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसके प्रथम तीन अध्यायों में प्राकृत के वर्णवृत्तों का तथा शेष पाँच अध्यायों में अपभ्रंश के छन्दों का विशद विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। लोकभाषा में काव्य रचनाकर स्वयम्भू ने अपभ्रंश को साहित्यिक गरिमा प्रदान करने का महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्य किया और सदा के लिए अमर हो गये। महाकवि तुलसीदास से शताब्दियों पर्व उन्होंने लोकभाषा में काव्य-सजन को प्राथमिकता दी थी। महाकवि बाणभट्ट की तरह इनकी अधूरी कृतियों को भी पूरा करने का श्रेय इनके पुत्र त्रिभुवन को प्राप्त है। वस्तुतः महाकवि स्वयम्भू अपभ्रंश के प्रथम आचार्य और कालजयी रचनाकार हैं। 'पउमचरिउ' में उनकी मौलिक उद्भावनाएँ अत्यन्त आकर्षक और मनोहारी हैं। इस दृष्टि से 'पउमचरिउ' के प्रारम्भ

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