Book Title: Apbhramsa Bharti 1995 07
Author(s): Kamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka, Gopichand Patni
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 73
________________ अपभ्रंश भारती 7 • मच्छरों के भय से गायें ऊंचे स्थल पर चली गयी हैं। गोपांगनाएं अपने प्रियतमों से मनोहर क्रीड़ाएं कर रही हैं। यह सब देखकर विरह-विदग्धा नायिका को कामदेव ने बेबस कर दिया है । इस प्रकार प्रिय - विरह में रात्रि व्यतीत करना कितना कठिन है ? ग्रीष्म ऋतु की तपन तो शान्त हो गई, किन्तु प्रिय विरहोत्पन्न तपन का क्या करें ? सच ही कहा है 62 पुण वि पिएण व उल्हवइ पियविरहग्गि निति ॥ 138 ॥ प्रिय की विरहाग्नि प्रिय द्वारा ही बुझती है, इसमें कोई भ्रांति नहीं । - 'वर्षा विगत शरद् ऋतु आई' । जैसे-तैसे वर्षाकाल तो व्यतीत कर दिया किन्तु अब शरद् ऋतु आ गई है। यह समय किस प्रकार व्यतीत होगा ? महाकवि अब्दुल रहमान ने 'संदेश - रासक' में शरद् का वर्णन करने में अत्यधिक रुचि दिखाई है। ग्रीष्म का वर्णन 16 छन्दों में, वर्षा का 18 छन्दों में तथा शरद् का वर्णन 27 छन्दों में कर शरद्-चित्रण के प्रति अपनी अभिरुचि का प्रदर्शन किया है। वस्तुत: 'संदेश रासक' के कवि ने 'षट्ऋतु वर्णन' के बहाने विरहिणी की मार्मिक भावनाओं का उद्घाटन ही किया है। आकाश में उदित अगस्त्य नक्षत्र से शरदागम की सूचना मिल जाती है और सर्वत्र शरद की चन्द्रिका ज्योतित हो उठती है गय विद्दरवि बलाहय गयणिहि, मणहर रिक्ख पलोइय रयणिहि । हुयइ वासु छम्भयलि पुणिंदह, पुरिय जुन्ह निसि निम्मल चंदह ॥ शरदागमन पर आकाश में बादल फट गये हैं। रात तारों से छा जाती है। सर्प बिलों में घुस जाते हैं और सर्वत्र चांदनी छिटकने लगती है। तालाबों का जल कमल-दल से पुनः शोभित होने लगता है। हंस कल-कल ध्वनि करने लगते हैं । सरोवर-तटों पर श्वेत काश खिल उठता है। जल स्वच्छ होकर दर्पणवत प्रतिबिम्बित होने लगता है। हंसों का आवागमन बढ़ जाता है। लेकिन साथ ही शरदकाल में जल छीजने के साथ विरहिणी नायिका भी छीजने लगती है। जुगनुओं की चमक और सारसों की सरस ध्वनि हृदय विदीर्ण करने लगती है। इसके विपरीत संयुक्ताओं का हृदय आनन्दोल्लास से ओत-प्रोत होने लगता है। इस प्रकार कवि ने अत्यधिक सरस, मनोहारी एवं मनोवैज्ञानिक चित्र उकेरने का सफल प्रयास किया है। एक चित्र द्रष्टव्य है। - अच्छहि जिह सन्निहि घर कंतय । रच्छिहि रमहि ति रासु रमंतय । करिवि सिंगारु विविह आहरणिहिं, चित्तविचित्तर्हि तणु पंगुरणिहिं ॥ 167 ॥ तिलु भालयालि तुरक्कि तिलक्किव, कुंकुम चंदणि तणु चच्चकिव सोरंडहिं करि लियहि फिरंतिहि, दिव्व मणोहरु गेउ गिरंतिहि ॥ 168 ॥

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