Book Title: Apbhramsa Bharti 1995 07
Author(s): Kamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka, Gopichand Patni
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 51
________________ 40 अपभ्रंश भारती7 - कोई बाणों के मार से ऐसे अवरुद्ध हो जाता मानो नरक में जाते हुए किसी को किसी आचार्य ने रोक लिया हो। x - कुम्भकरण ऐसा निकला मानो नभ में 'धूमकेतु' उगा हो। कवि स्वयंभू के उपमान बार-बार नवीनता लिए हुए आते हैं। इसीलिए पाठक की रोचकता निरन्तर वृद्धि पाती रहती है। अधिक कहने से क्या ? उसके समस्त कथ्य उपमानों पर ही आधारित हैं। काव्यकार द्वारा प्रयुक्त उत्प्रेक्षाएं सभी क्षेत्रों में प्रवेश कर चुकी हैं। रत्नाकररूपी पउमचरिउ काव्य में उत्प्रेक्षा अलंकाररूपी अभिनव नौकाएँ तैर रही हैं। 4/49, कूचा भवानीदास फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश - 209 625

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