Book Title: Anusandhan 2015 12 SrNo 68
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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अनुसन्धान-६८
नेमिविज्ञानकस्तूरसूरि ज्ञानमन्दिर - सूरत, अङ्क ५४, पृ. ११३-११७. २१. रत्नाकरपच्चीसी-भास - क. - उपा. श्रीदीपचन्द्र → श्रीदेवचन्द्रजी,
सं. - मुनि श्रीसुयशचन्द्र-सुजसचन्द्रविजयजी; गुजराती, ३४ कडी, रत्नाकरपञ्चविंशतिकानो गुर्जर पद्यानुवाद, आदि - श्रेयश्रीरतिगेह छो जी सुरनरपती नतपाय, अन्त - संगभक्ती भविक जिवने करो मंगलवृंद ए;
अङ्क ५४, पृ. ११८-१२१. २२. साध्वाचारषट्त्रिंशिका - क. – मुनि श्रीरूपचन्द्र, सं. - श्रीविजयशीलचन्द्र
सूरिजी, संस्कृत, ३६ श्लोक, शिखरिणीछन्द, आदि - गृहीत्वा वैराग्यं गृहपरिगृहीत्या विरहितो, अन्त - ०नन्दार्थं प्रार्थ्यमानो निखिलतनुभृतां भूयसे श्रेयसे स्तात्; प्रत - जैन आत्मानन्द सभा - भावनगर; ले.सं.
१९६२; अङ्क ५४, पृ. १२२-१२८. २३. पार्श्वनाथस्तोत्रम् - क. - खरतरगच्छीय जिनराजसूरिजी, सं. - म.
विनयसागर; संस्कृत, ९ श्लोक, मुखनी स्तुति, आदि - आनन्दनं समसुरासुरमानवानां सञ्जीवनं शुभधियां सुरमानवानाम्, अन्त - दृष्टिं प्रसादविशदां मयि सन्निधेहि; प्रत - जिनभद्रसूरि ज्ञानभण्डार - जैसलमेर;
अङ्क ५४, पृ. १२९-१३०. २४. श्रावकद्वादशव्रतचतुष्पदिका - क. - अज्ञात, सं. - म. विनयसागर;
अपभ्रंश, १९ कडी, आदि - वंदवि वीरु भविय निसुणेहु, अन्त - जीवदया विणु धर्म न होइ; प्रत - जिनभद्रसूरि ज्ञानभण्डार - जैसलमेर;
अङ्क ५४, पृ. १३१-१३२. २५. नेमिजिनस्तुति-प्रकाशटीका - क. - चतुर्भुज, टीका. - श्रीरामचन्द्रर्षि
(लोकागच्छीय), सं. - मुनि श्रीशीलचन्द्रविजयजी (डहेलावाळा); संस्कृत, ९ श्लोक, सममात्र छन्द, टीका, र.सं. १९२३, आदि - जय जय यादववंशावतंसजगत्पते!, अन्त - चतुर्गतिभ्रान्तिहरः शिवङ्करः; प्रत -
ले.सं. १९२४, बालुचरनगर; अङ्क ५४, पृ. १४०-१४७. २६. सकलकुशलवल्ली-टीका - क. - श्रीवछराज गणि, सं. - सा. श्रीललित
यशाश्रीजी; संस्कृत, गद्य, आदि - भो भव्यजनाः! स श्रीपार्श्वनाथो भवतां...;

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