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१२, वर्ष ४२, कि० ४
अनेकान्त
साधु की निन्दा कई लोग करते देखे जाते हैं। पर, के शिथिलाचार के प्रति त्यागी भी चिंतित हैं। श्री ऐलक निन्दा करने से कुछ हाथ नही अ:येगा। यदि श्रावकगरण सुध्यान सागर जी ने अभी जो विज्ञप्ति प्रकाशित कराई अपने मे सावधान हों और साधुओ का घिराब बन्द करे- है वह ध्यान देने योग्य है। उसे हम यहां उद्धृत कर रहे उनसे पीछी का आशीर्बाद, कमण्डलु का पानी, गण्डा, है-- तावीज, मत्र-तंत्र न मागे। बड़े-बड़े पण्डालो में ऊची "जितनी हमारी जैन सस्थाएं हैं उनके पदाधिकारी स्टेजें बनाकर हजारों की भीड मे उन्हे न घेरें, तो साधु गण मिलकर आकल साधु मार्ग मे जो शिथिलाचार की के अह को ब्रेक लग सकता है-वह अपने में सावधान वृद्धि हो रही है उसको दूर करने का प्रयत्न करें तो रह सकता है । कुछ समाचार पत्र भी साधुओ को उछाल मूलसंघाधिपति प० पू० १०८ अजितसागर जी का आशीकर उनके अह को बढ़ावा देते हैं। जब साधु समाचार मे वर्वाद तथा आदेश लेकर प्रत्येक शिथिलाचार का पोषण अपने को आगे पाता है तो उसे यश का अहं जागता है. - करने वाले आचार्य साधुओ के पास पहुंचें, उनसे शान्ति वह पद से च्युत भी हो जाता है सामाजिक उथल-पुथल से स्पष्ट कहें कि जो-जो आगम विरुद्ध क्रिया उनसे हो और दूसरो के सुधार के चक्कर में पड़ जाता है। रही है, जैसे--एकाकी रहना, एक स्त्री साध्वी को रखना __ आज जैन समाचार पत्रो की दशा भी दयनीय है-- चदा-चिट्ठा करना, गंडा-तावीज बेचना, बस (मोटर)-वाहन प्रायः सभी में एक जैसे समाचार ही रहते है जैसे इसके रखना, संस्था बनाके वही पर जम जाना, कलर, फ्रीज, सिवाय उन्हें छापने को कुछ और रह ही न गया हो। पखा, वी० सी० आर० टेलीविजन आदि जिनागम के फलत:-जनता के मन बहलाव को वे मुनियो की स्थान. विरुद्ध वस्तुओ का रखना तथा उपयोग करना एव जवान स्थान पर उपस्थिति दिखाकर रनके आशीर्वादो की कन्याओं को साथ रखना, उनका ससर्ग करना, एकाकी घोषणा का प्रचार भी करते रहते है और इससे मुनि के साध्वी को बगल के कमरे में सोने देना, इत्यादि धर्म-हा। अहं को पोषण मिलता है। पेपर वाले मुनि का आशीर्वाद क्रियाओ को अवश्य रोकना चाहिए। साम, दाम, दण्डले, अपनी दुकानदारी जमाते हो, यह बात दूसरी है।
भेद से द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की मर्यादा रखते हुए यदि सुधार अपेक्षित है नो सभी को एकमत होकर Aaya की रक्षा करनी साधु सस्था को ठीक करना चाहिए। क्योकि आज मुनियों
-सम्पादक (पृ० २४ का शेषाश) प्राप्ति होती है। प्रामाणिमक पूर्वाचार्य गणधरादिक उनकी व्याख्याता बनकर गणधरो के ऊपर जैसे बैठना चाहते वाणी का विस्तार करने में समर्थ हुए। सभी ने राग-द्वेष हो-अपनी रचनाओ को जिनवाणी मनवाने के जाल की निवत्ति को आत्मधर्म बताया। राग-द्वेष ही घोर बुन रहे हो, तब भी आजचयं नही। पर, स्मरण रहे। हम परिग्रह है-इनमें ही क्रोः, मान-माया-लोभ का उदय तत्त्व के सम्बन्ध मे लिखी आधुनिक मभी व्याख्याओ होता है। हिसादिक पाप भी इन्हीं परिग्रहो के कारण से या भाषान्नरों को किसी भी भौति आगम मानने के होते है-अतः परिग्रहों के त्याग पर बल देना जैनी का पक्षधर नही। दमारी दृष्टि आरातीय निष्परिग्रही कर्तव्य है। स्मरगा रहे कि आज जैन के ह्रास में मत आचार्यों की मूल शब्दावली पर ही है-हम उसे ही कारण परिग्रह और परिग्रहियो को परिग्रह वृत्ति है।
आगम मानते है और बार-बार उद्घोष करते है कि तीर्थंकर ऋषभदेव की धर्म सभा में प्रधान शासन
आगम सुरक्षा के लिए फर वदल के बिना मूल शब्दो के गणधरदेव का ही रहा-उन्हीं के व्याख्यान को प्रामा
अर्थ मात्र दिए जायें और यदि व्याख्या करना इष्ट हो तो णिकता मिली। और वह इसलिए कि गणधर भी अपरि
मौखिक ही की जाय ताकि गलत रिकार्ड की आशंका से ग्रही थे-अतः वे तत्त्व को यथार्थ कह सके । आज तो
बचा जा सके। यदि उक्त विसगतियो के ठीक होने को वैसे गणधर दुर्लभ है-अब तो प्राय. वाचक भी परिग्रह दिशा में कदम उठाया जाता है तो निर्वाण उत्सव के के नशे में झूमते है . कई परिग्रह की बढ़वारी में और
बहाने जैन के निर्माण में सहायता मिल सकेगी। शुभमस्तु कई यरिग्रह की तृष्णा में। कई तो शास्त्र-निर्माता या सर्वजगता।
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