Book Title: Agam 13 Upang 02 Rajprashniya Sutra Stahanakvasi
Author(s): Madhukarmuni, Ratanmuni
Publisher: Agam Prakashan Samiti

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Page 288
________________ अभिमत श्रमणसूर्य मरुधरकेसरी प्रवर्तक मुनिश्री मिश्रीमलजी महाराज [छप्पय] जैनागम बत्तीस गहन सागर रत्नाकर, भरा छलाछल ज्ञान आत्म का करन उजागर / यह हिन्दी अनुवाद मनोहर करण विचारा, तज प्रमाद को दूर सूर बन मन दृढ़ धारा। अच्छे सहयोगी मिले शीघ्र प्रकाशन कर लिया धन्यवाद देऊ सतत कल्पवृक्ष सा रच दिया // 1 // साहस-युत सुध सेव पुण्य के उदय मिली है, देख प्रकाशन शुभ्र हृदय की कली खिली है। एकादश हैं अंग और उपांगज बारा, चार छेद चतु मूल और आवश्यक प्यारा / टिप्पण देकर और भी खूब खुलासा पा गए, भव्य ! पढो बल भाव से ज्ञान-खजाने पा गए॥२॥ सरल और सश्रीक भावयत भाषा लीनी, युवाचार्य बन प्रथम ज्ञान-गंगा बहा दीनी / पत्राकार यदि होत श्रमण-श्रमणी मन भाते, तदपि हैं सजिल्द पत्र कहिं बिखर न जाते / दोय मंजुषा में सभी पेक करा कर संघ को, भेजे यत्न के सहित रख कर लहे उमंग को // 3 // चरण करण अरु धर्म द्रव्य अनुयोग चार हैं, पागम के अभिराम भरा परमार्थ-सार हैं। नय निक्षेप प्रस्तार अंक अरु फलिक लहरो, भांगे विविध प्रकार भगवती बीच शहरी। अनुयोगद्वार प्रादिक सबी चन्द्र-सूर्य प्रज्ञप्ति वर, बड़ी शोध करके अहा! उसे छपाना विज्ञवर // 4 // सम्पादक-मण्डल सहित, प्रिन्टकार आदीय / अर्थराशि दाता प्रति, धन्यवाद रमणीय // -आचार्य श्री रघुनाथ जैनस्मृतिभवन, पाली 23-1-82 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibi


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