Book Title: Agam 11 Ang 11 Vipak Sutra Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
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विपाकचन्द्रिका टीका श्रु. २, अ. १, सुबाहुकुमारवर्णनम्
॥ मूलम् ॥ से णं सुबाहुदेवे ताओ देवलोगाओ आउक्खएणं भवक्खएणं ठिइक्खएणं अणंतरं चयं चइत्ता माणुस्सं विग्गहं लभिहिइ, केवलं बोहिं बुज्झिहिइ, बुज्झित्ता तहारूवाणं थेराणं अंतिए मुंडे जाव पव्वइस्सइ। से णं तत्थ बहूई वासाइं सामण्णपरियागं पाउणिहिइ, पाउणित्ता आलोइय-पडिक्कते समाहिपत्ते कालमासे कालं किच्चा सणंकुमारे कप्पे देवत्ताए उववजिहिइ । तओ माणुस्सं, पव्वज्जा, बंभलोए, माणुस्सं, महासुक्के, माणुस्सं, आणए, माणुस्सं, आरणए, माणुस्सं, सव्वसिद्धे । से णं तओ अणंतरं उबहित्ता महाविदेहे वासे जाई अड्ढाइं जहा दढपइण्णे सिज्झिहिइ । एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं सुहविवागाणं पढमस्स अज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते त्ति बेमि ॥ सू० १३ ॥ ॥ इति पढमं अज्झयणं समत्तं ॥
टोका 'से गं' इत्यादि । 'से णं सुबाहुदेवे' स खलु सुबाहुर्देवः 'ताओ देवलोगाओ' तस्मात् सौधर्मनामकात् देवलोकात् 'आउक्खएणं' आयुःक्षयेण= करते हुए समाधिभाव से काल कर सौधर्मस्वर्ग में-जहां दो सागर की उत्कृष्ट स्थिति है वहां-देवकी पर्याय से उत्पन्न हुए ॥सू० १२॥
___ 'से णं सुबाहुदेवे०' इत्यादि।
__ अब ‘से णं सुबाहुदेवे' वह सुबाहुदेव 'ताओ देवलोगाओ' उस देवलोक से 'आउक्खएणं' आयु के क्षय से-आयु कर्म के दलिकों की ભાવથી કાલ પામવાના અવસરે કાલ પામીને સૌધર્મ સ્વર્ગમાં-જ્યાં બે સાગરની ઉત્કૃષ્ટ સ્થિતિ છે ત્યાં-દેવની પર્યાયથી ઉત્પન્ન થયા. (સૂ૦ ૧૨) ___ 'सेणं मुबाहुदेवे' त्यादि.
वे 'से णं सुबाहुदेवे' ते सुमा १ 'ताओ देवलोगाओ' ते ४थी 'आयुक्खएणं । मायुश्यना यक्ष यता-मायुभना लिन नि। थवाथी.
શ્રી વિપાક સૂત્ર
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