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________________ श्री कल्पमुः। क्तावल्यां यतः-जाति 1 लाभ 2 कुलै 3 श्वर्य४ बल 5 रूप 6 तप 7 श्रुतैः८॥कुर्वन् मदं पुनस्तानि हीनानि लभते जनः॥४२॥ सप्तविंशति गते निर्वाणमादीशे विहरन्मुनिभिः सह // प्रतिबोध्यजनान्-शिष्यान साधनाङ्करुते सुधीः॥४३॥ Hभव वृत्तांतः दुःखितस्य कदा तस्य वैयावृत्यं न कश्चन // कुरुते खेदमापन्नश्चिचिन्तेति हृदन्तरे // 44 // अहो कष्टं महाकष्टं साधवः संस्तुता अपि // अन्यथैव विभाव्यन्ते कष्टे स्वस्य न कश्चन // 44 // भवामि चेद्यदा स्वस्थस्तदा शिष्यङ्करोम्यहम् // वैयावृत्तकरं दक्षं विना संक्व च मे सुखम् // 46 // क्रमशः पटुतां लेभे विजहे सह साधुभिः॥ एकदा कपिलः कश्चिद्राजपुत्रो विलक्षणः॥४७ // आकर्ण्य देशनान्तस्य प्रतिबुद्धः शुभाशयः॥ मरीचिः प्रोक्तवानेनं मुनीनां सविधे व्रज // 48 // दीक्षागृहाण तेनोक्तग्रहिष्यामि तवान्तिके // भवानेव मया कार्यों गुरुः शास्त्रविशारदः॥४९॥ त्रिदण्डरहिता एते नाहं भद्र ? तथाविधः // तथापि कपिलः माह मरीचिम्पति सादरम् // 50 // भवतां दर्शने धर्मो भगवन् किं न विद्यते // मरीचिहृदये दध्यौ मद्योग्यः सुतरामयम् // 51 // जिन मार्गेऽपि धर्मोऽस्ति मम मार्गेऽपि कापिल ? // मरीचिर्दम्भमाश्रित्य जगादोत्सूत्रभारतीम् / 52 // मरीचेः सविधे दीक्षाञ्जग्राह कपिल स्तदा // तदाऽसौ शिष्यलाभेन लेभे सन्तोषमुत्तमम् // 53 // कोटाकोटि महाम्भोधि प्रमाणश्चाजयत्वसौ // उत्सूत्र भाषणेनैव, संसारमतिकष्टदम् // 55 // अनालोचित तत्पापो मरीचि स्तापसो मृतः // समाप्य तुर्य काशीति 'लक्षपूर्वायुरेव च / / 55 // चतुर्थे भवके चैव पञ्चमे देवलोकके // देवो जात स्ततच्युत्वा भवे पश्चम संज्ञके // 56 // // 12 //
SR No.600451
Book TitleKalpasutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanakvimalsuri
PublisherMuktivimal Jain Granthmala
Publication Year1968
Total Pages512
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_kalpsutra
File Size40 MB
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