________________ कल्पमुक्ता-का वल्यां सप्तविंशति भव वृत्तांतः // 59 // भावनाम्भावयत्येवं तदाऽसौ ग्रामनायकः॥ अतिथिर्यदिचेत्कश्चिदागच्छेदधुना वरम् // 3 // दत्वा चातिथये पूर्वम्भोजन ब्रह्मवर्चसे // भुञ्जीयाहं ततः श्रेयो जन्मापि सफलं मम // 4 // मध्याहे भुक्तिवेलायां सार्थ भ्रष्टान मुनीनसौ // दृष्टवा हृष्टो बभूवान्तः पन्था एष सतामिह // 5 // पतिलम्भितवान् साधू-नशनादि प्रदानतः // धन्योऽहमिति मन्वान स्तुतोष भृशमात्मनि // 6 // अनुभोजनमेवासौ मार्गदर्शन हेतवे // जगाम साधुभिः सार्द्धङ्कियहरमनिन्दितः // 7 // सद्भक्त्या विनयेनोक्त्या गुणवानेष सन्मतिः // योग्योऽयमुपदेष्टव्यो योग्येऽसौ'फलवान् भवेत् // 8 // धर्मोपदेशदानेन मुनिभि मिनायकः // सम्यक्त्वम्पापितश्शान्त मुनयो हितकांक्षिणः // 9 // परमेष्ठि नमस्कारस्कृत्वाऽन्ते देहमत्यजत् // द्वितीये च भवे देवो जज्ञे सौधर्म लोकके // 10 // ततश्च्युत्या भवे त्वेष तृतीये पुण्यवारिधिः॥ मरिचिस्तनयो जज्ञे भरतचक्रवर्तिनः // 11 // चक्रवर्तिमुतोप्येष वैराग्यपथमाश्रितः // अभ्यर्णे चादिनाथस्य दीक्षाञ्जग्राह सादरम् // 12 // स्थविराणामसौ पार्श्वे मुनीनां शीलशालिनाम् // एकादशाङ्गमध्यैष्ट शब्दार्थ ज्ञान पूर्वकम् // 13 // ग्रीष्मकाले कदा गच्छं स्तिग्मांशुरश्मि दीपिते // तत्तापतप्तदेहोऽयं दध्यौ क्लेशमशक्नुवन् // 11 // 1. उपदेश MAR RASAXY // 59 //