________________ कल्पमुक्ता वल्यां प्रथम व्याख्याने मेघकुमार कथा // 45 // शीघ्रमागत्य भो ? मेघ? तदा त्वमपि भीतिभाक्॥ मण्डलेऽस्मिन् स्थितः सम्यग्वह्निभीति प्रणाशके॥२८॥ कदाचित्पादमेकं त्वं देहकण्डूतिवाञ्छया // उत्पपाट च यावद्वै प्रविष्टः शशक स्तदा // 29 // कण्डूयित्वा च गात्रंवं पादं मुञ्चन् ददर्श च // शशकं व्याकुलं तत्र दवत्रस्तम्विशेषतः॥३०॥ सार्द्धदिनद्वय पादं कृपयाऽस्य तथा स्थितः // सहन्ते नु महाक्लेशं सन्तो हि सुदयाश्चिताः॥३१॥ वनवह्नौ प्रशान्तेऽथ गतेषु वनजीविषु // गमनेच्छुश्च शीघ्रं त्वं यावद् गच्छसि भोस्तदा // 32 // विलग्नभरण स्तत्र पपात फलवक्षिता // महाकष्टे समायाते जायते कीदशी दशा // 33 // दिनत्रयं क्षुधातृषापीडितः करुणापरः // समाप्य शतवर्षायुर्जानकर्मगतिन्तथा // 34 // श्रेणिकधरणीगर्भ मेघकुमार नामकः // पुत्रत्वेन त्वजातो विद्धीत्यश्चरितं स्वकम् // 35 // तिर्यग्भवेऽपि भो मेव? धर्मार्थमिह वै खया // नानादुःखानि सोढानि तप्यसे ह्यधुना कथम् // 36 // साधनां विश्ववन्द्यानां पादैः सङ्घटितोऽधुना // दूयसे च कथञ्चिन्त हृदये स्वस्व निर्मले // 37 // रम्योपदेशवोधेन धर्म मेघकुमारकः॥ श्रीवीर प्रभुणा साधु स्थिरीकृतो विशेषतः // 38 // प्रभूपदेशमाकर्ण्य जातिस्मृति स्ततोऽभवत् // भवद्वयश्च संस्मृत्य वैराग्यपथमाश्रितः // 39 // निमील्य नयने ध्यानाच्चकाराभिग्रहन्तदा // शरीरं मयकाऽन्यञ्च त्यक्तमेवाखिलं खलु // 40 // निरतिचार पूर्वेण चाराध्य चरितं मुनिः // प्रान्ते संलेखनाचक्रे मासिकीम्विधिवमना // 41 // // 45 //