________________ कल्पमुक्ता वल्यां प्रथम व्याख्याने दशकल्प | अधिकारः // 31 // अथ सप्तवस्तूनि रक्तानि शरीरेषु तद्यथा नख 1 चरण 2 हस्त 3 जिह्वा 4 ओष्ठ 5 तालु 6 नेत्रकोणके 7 इति सप्तरक्तानि-कक्षा 1 हृदयं 2 ग्रीवा 3 नाशिका 4 नखा 5 मुखं 6 इति पदुन्नतानि-दन्ताः 1 त्वचा 2 केशाः 3 अङ्गुलि पर्वाणि 4 नखाः 5 इति पञ्च सूक्ष्माणि-नेत्रे 1 हृदयं 2 नासिका 3 हनु 4 भुजौ 5 इति पञ्च दीर्घाणि-कपालं 1 वृक्षस्थलं 2 मुखं 3 इति त्रीणि विस्तीर्णानि-ग्रीवा 1 जंघा 2 पुरुष चिह्न 3 इति त्रीणि लधूनि-सत्त्वं 1 स्वरः 2 नाभिः 3 इति त्रीणि गम्भीराणि इति द्वात्रिंशल्लक्षणनि // इह भवति सप्तरक्तकः षडुन्नतः पञ्च सूक्ष्म दीर्घश्च // त्रिविपुललघु गम्भीरो द्वात्रिंशल्लक्षणः स पुमान् // 1 // यथा नेत्रे तथा शीलं यथा नासा तथाऽऽर्जवम् // यथा रूपं तथा वित्तं यथा शील तथा गुणाः॥२॥ अतिहस्वेऽतिडीर्वेऽति स्थूले वातिकशे तथा // अतिकृष्णेऽति गौरे च षट्पु सत्वं निगद्यते // 3 // सद्धर्मः सुभगो नीरुक सुस्वप्नः सुनयः कविः // सूचयत्मात्मनः श्रीमान् नरः स्वगगमागमौ // 4 // निर्दम्भः सदयो दानी दान्तो दक्षः सदा-ऋजुः // मर्त्ययोनेः समुद्भूतो भविता च पुन स्तथा // 5 // मायालोभक्षुधाऽऽलस्य बहाहारादि चेष्टितैः // तिर्यग्योनि समुत्पत्तिं ख्यापयत्यात्मनः पुमान् // 6 // सरागः स्वजन द्वेषी दुर्भाषी मूर्खसङ्गकृत्- // शास्ति स्वस्य गतायातं नरो नरकवर्मनि // 7 // // इति चतुर्गति स्वरूपम् // ARCH // 31 //