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________________ m कल्पमुक्ता प्रथम व्याख्याने वल्यां | दशकल्प // 25 // अधिकारः अथ व्याख्या-उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रे द्रव्यतः केशान् उत्पाटय भावतो. रागद्वेषौविहाय-गृहावासं परित्यज्य दीक्षा गृहीता // 3 // उत्तराफाल्गुनीनक्षत्रे श्री भगवतो महावीर स्वामिनोऽनन्तवस्तु ज्ञापकम्-अनुपमम् समस्तवस्तुव्याघातरहितम् / भित्तिकटादिभिरस्खलितम् समस्तावरणदोषरहितम्-परिपूर्ण केवलज्ञानं केवलदर्शनञ्च समुत्पन्नम् // 4 // तथा च स्वातिनक्षत्रे भगवान् निर्वाणपदं लेभे // 5 // मूलपाठः तेणं कालेग तेणं समरणं समणे भगवं महावीरे जे से, गिम्हाणं चउत्त्थे मासे अहमे पक्खे आसाढशुद्धे तस्स णं आसाढसुद्धस्स छट्ठी पक्खे णं महाविजय पुप्फुतर पवर पुंडरीयाओ महाविमाणाओ वीसं सागरावमहिइयाओ आउक्खएणं भवक्खएणं ठिइक्खएणं-अणंतरं चयं चइत्ता // 2 // इति अथ व्याख्या-तस्मिन् काले तस्मिन् समये श्रमणो भगवान् महावीरः ग्रीष्मकालस्य चतुर्थमासे-अष्टमपक्षे आषाढ शुक्लषष्ठी रात्रौ महासौख्यकारकात्-विंशतिसागरोपमस्थितिकात्-पुष्पोत्तराभिधमहाविमानात्-विंशतिसागरोपमरूपदेवायुः पूर्णीकरणात्-देवगतिनामकर्मक्षयेण वैक्रियशरोरस्थितिक्षयेण दिव्यशरीरं त्यक्त्वा-अन्तररहितच्च्युत्वा मूलपाठः-इहेव जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे दाहिणडूढभरहे इमीसेआसप्पिणीए, सुसममुसमाए, समाए वइक्ताए, सुसमाए, समाए वइक्कंताए, सुसमदुसमाए, समाए, वइकंताए, दुसुम मुसमाए, समाए, बहुवइकंताए, सागरावमकोडाकाडीएवायालीसाए, वाससहस्से ह ऊगियार पंचहत्तरि वासेहि, अद्धनवमेहि, यमासेहि, सेसेहि, इक्वीसाए, तित्थयरेहि इक्खा-गकुल समुपन्नेहिं कासवगुत्तेहिं दोहिय हरिवंसकुल समुपन्नेहिं गोयमसगुतेहिं तेवीसाए तित्थयरेहिं वइकंतेहिं, समणे // 25 // JAI
SR No.600451
Book TitleKalpasutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanakvimalsuri
PublisherMuktivimal Jain Granthmala
Publication Year1968
Total Pages512
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_kalpsutra
File Size40 MB
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