________________ न कल्पमुक्तावल्यां प्रथम | व्याख्याने दशकल्प अधिकारः // 17 // // पुनरपितन्महिमा / तथाहि निजेरेषु यथाशक्रः श्रीरामो हि यथा नृषु // रूपवत्सु यथा कामो रम्भा रूपवतीषु च // 2 // वादित्रेषु यथा भम्भा गजेष्वेरावणो यथा // उत्साहिषु दशग्रीवो धीमत्सु च यथाऽभयः // 3 // तीर्थेष्वे वं स्वर्णशैलो विनेयोऽथ गुणेषु च // रसालः पादपेष्वेवं धानुष्केषु धनञ्जयः // 4 // परमेष्ठिनमस्कारो मन्त्रेषु च यथोत्तमः // सर्वशास्त्रसमूहेषु कल्पसूत्रं तथोत्तमम् // 5 // नाहतः परमो देवो न मुक्तेः परमं पदम् // न श्री शत्रुजयात्तीथें श्रीकल्पानपरं श्रुतम् // 6 // // अथ कल्पसूत्रस्य कल्पोपमानं यथा // वृत्तवीरप्रभोश्चवीजसदृशं श्रीपार्श्ववृत्ताङ्करः स्कन्धाभं प्रभुनेमिनाथचरितं शाखाममादिप्रभोः॥ पौष्याभं स्थविरावलिश्च सुरभे स्तुल्य समाचारिका॥ निर्वाणश्च फलं ततोऽस्य घटते कल्पोपमा सुन्दरा // 7 // वाचनात्सहाय्यदानात-सर्वाक्षरथुतेरपि // विधिनाराधितः कल्पः शिवदोऽन्तर्भवाष्टकम् // 8 // एगग्गचित्ता जिणसासणम्मि-पभावणापूअपरायणाजे॥ तिसत्तवारं निसुणंति कप्पं भवण्णवं गोअम? ते तरन्ति // 9 // श्रुत्वा च कल्पसूत्रस्य माहात्म्यं मोक्षहेतुकम् // तपस्याधर्मकार्येषु न चालस्यं समाचरेत् // 10 // तपः स्वाध्यायधर्मादिसत्कार्यहेतुभिरिदम् // ईप्सितफलदायि स्याद्योग्यक्षेत्रोप्तबीजवत् // 11 // 1 हिरण्याद्रिरित्यपिपाठः // 17 //